गुरु ग्रंथ साहिब 121 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1हे नानक ! जो व्यक्ति परमेश्वर के नाम में मग्न रहते हैं, वे परमेश्वर के बारे ही विचार करते रहते हैं और सत्य-परमेश्वर के सत्य-नाम की ही कमाई करते हैं॥८॥१८॥१९॥
2माझ महला ३ ॥
3शब्द निर्मल है और वाणी भी निर्मल है।
4भगवान की निर्मल ज्योति समस्त जीवों में समाई हुई है।
5मैं निर्मल वाणी द्वारा भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता हूँ और निर्मल परमात्मा का भजन करके अपने मन की अहंत्व रूपी मैल को दूर करता हूँ॥ १ ॥
6मैं तन एवं मन से उन पर कुर्बान हूँ, जो सुखदाता परमात्मा को अपने हृदय में बसाते हैं।
7मैं गुरु के शब्द द्वारा निर्मल भगवान की महिमा-स्तुति करता हूँ और नाम को सुनकर अपनी तृष्णा को मिटा देता हूँ॥१॥ रहाउ॥
8अब निर्मल नाम आकर मेरे मन में बस गया है,
9जिससे मेरा मन एवं तन निर्मल हो गया है और मेरे अन्तर्मन में से मोह-माया का विनाश हो गया है।
10जो व्यक्ति नित्य ही सत्य-परमेश्वर का गुणानुवाद करता है, उसके मन में निर्मल नाद अर्थात, अनहद शब्द गूंजने लग जाता है।॥२॥
11जो व्यक्ति गुरु से नाम रूपी निर्मल अमृत प्राप्त कर लेता है,
12उसके मन में से अहंकार नष्ट हो जाता है और उसके अन्तर्मन में माया का मोह नहीं रहता।
13उसके मन में निर्मल ज्ञान उत्पन्न हो जाता है और निर्मल प्रभु में उसका पूर्ण ध्यान लगता है। वह निर्मल वाणी को अपने हृदय में बसा लेता है॥३॥
14जो व्यक्ति निर्मल परमात्मा की सेवा करता है, वह भी निर्मल हो जाता है।
15वह गुरु के शब्द द्वारा अपने अन्तर्मन में से अहंकार की मैल को स्वच्छ कर लेता है।
16उसके मन में अनहद वाणी की निर्मल ध्वनि गूंजने लग जाती है और वह सत्य परमेश्वर के दरबार में बड़ी शोभा प्राप्त करता है॥४॥
17निर्मल प्रभु से सभी निर्मल हो जाते हैं।
18निर्मल भगवान का नाम मनुष्य के मन को स्वयं में पिरो लेता है।
19सौभाग्यशाली व्यक्ति ही निर्मल नाम में लगते हैं और निर्मल नाम द्वारा शोभा के पात्र बन जाते हैं॥ ५ ॥
20वहाँ व्यक्ति निर्मल हैं, जो शब्द द्वारा सुन्दर हो जाते हैं।
21निर्मल नाम उनके तन एवं मन को मुग्ध कर देता है।
22सत्य-नाम में ध्यान लगाने से मन को कभी भी अहंकार की मैल नहीं लगती। सत्य-नाम उसके मुख को प्रभु के दरबार में उज्ज्वल करा देता है॥ ६ ॥
23मन माया के मोह में फँसकर मैला हो जाता है।
24यदि मन मैला हो तो उसका चौका भी अपवित्र है और वह स्थान भी अपवित्र है।
25वह अपवित्र भोजन सेवन करके अपने पापों की मैल और भी अधिक बढ़ा लेता है। ऐसा मनमुख पापों की मैल के कारण बड़ा दुखी होता है।॥७॥
26सभी जीव भगवान के हुक्म में ही मैले अथवा निर्मल बने हैं।
27लेकिन वही मनुष्य निर्मल है जो सत्य-परमेश्वर को प्रिय लगता है।
28हे नानक ! जो गुरु के माध्यम से अपने अहंकार की मैल को दूर कर लेता है, नाम उसके मन में ही आकर निवास करता है ॥८ ॥२० ॥२१॥
29माझ महला ३ ॥
30गोविन्द उज्ज्वल (सरोवर) है और गोविन्द का अंश जीवात्मा भी उज्ज्वल है।
31नाम-सिमरन से मेरा मन, वाणी एवं बुद्धि सब निर्मल हो गए हैं।
32मन उज्ज्वल होने से मेरा मुख हमेशा ही सुन्दर लगता है। मैं अत्यन्त उज्ज्वल नाम का सिमरन करता रहता हूँ॥१॥
33मैं उस पर तन एवं मन से कुर्बान हूँ जो गोबिन्द का यशोगान करता है।
34वह दिन-रात गोविन्द-गोविन्द बोलता रहता है और वाणी द्वारा दूसरों को भी गोविन्द की महिमा सुनाता रहता है।॥१॥ रहाउ॥
35जो व्यक्ति सहज-स्वभाव ही गोविन्द का गुणानुवाद करता है,
36गुरु के भय से उसकी अहंकार रूपी मैल दूर हो जाती है और वह उज्ज्वल हो जाता है।
37जो व्यक्ति दिन-रात भगवान की भक्ति करता है वह सदैव आनंदपूर्वक रहता है। वह दूसरों से भगवान की महिमा सुनता है और स्वयं भी उसकी महिमा-स्तुति करता है॥ २॥
38भक्ति करने से मनुष्य का मन प्रसन्न होकर नृत्य करने लग जाता है।
39वह गुरु की वाणी द्वारा अपने अशुद्ध मन को शुद्ध मन में ही मिलाकर रखता है।
40माया के मोह को दूर करना ही गुरमुख का ताल बजाना है। उसका नाम-सिमरन ही नृत्य करना है|॥ ३ ॥
41जो जोर-जोर से चिल्लाता है और अपने तन को गिराता है,
42माया ने उसे मुग्ध किया हुआ है। यम उसकी तरफ देख रहा है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं