गुरु ग्रंथ साहिब 1216 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji
1मनुष्य उनके साथ प्रेम लगाकर घुला-मिला रहता है, जो मूर्ख बिल्कुल काम नहीं आते ॥१॥
2मैं कुछ भी नहीं, न ही मेरा कुछ अपना है और हमारा कोई वश नहीं चल सकता।
3हे नानक के प्रभु ! तू ही सब करने करवाने वाला है और संतों की संगत में ही उद्धार होता है॥ २ ॥ ३६ ॥ ५६ ॥
4सारग महला ५ ॥
5मोहिनी माया पूरे संसार को मोहित करती है और किसी के रोकने पर भी नहीं रुकती।
6साधक, सिद्ध पुरुषों सबकी प्राण प्यारी है और किसी के तोड़ने पर भी नहीं टूटती ॥१॥रहाउ॥।
7जिव्हा से छ: शास्त्रों का उच्चारण करने या तीर्थ यात्रा करने पर भी इसका प्रभाव कम नहीं होता।
8पूजा करने वाले, माथे पर तिलक लगाने वाले, व्रत-उपवास, नियम धारण करने वाले तथा तपस्वियों का भी यह साथ नहीं छोड़ती॥१॥
9यह जगत अज्ञान के अंधे कुएं में गिरकर पतित हो रहा है। हे संत पुरुषो ! मेरी परमगति कर दो।
10नानक फुरमाते हैं कि सच्चे साधुओं की संगत में किंचित दर्शन मात्र से मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥२॥ ३७ ॥ ६० ॥
11सारग महला ५ ॥
12हे प्राणी ! धन-दौलत कमा कर तू क्या कर रहा है?
13तेरा शरीर हवा से भर कर फूल गया है और देह रूपी तेरी मटकी बहुत पुरानी हो गई है॥१॥रहाउ॥।
14जैसे बाज मॉस को झपट कर ले जाता है, उसी तरह तुम धन को छीनकर किसी अन्य जगह रख देते हो।
15हे अंधे ! तुझे देने वाला परमात्मा भूल गया है, जैसे यात्री दुकान में बैठकर अपना पेट भर लेता है, मगर खाना देने वाले को भुला देता है॥१॥
16तू विकारों के स्वाद एवं झूठ रसों में ही मस्त है, जहाँ जाना है, वह रास्ता बहुत मुश्किल है।
17नानक कहते हैं कि हे मूर्ख ! इस तथ्य को समझ लो, आज अथवा कल तेरी मौत निश्चय है ॥२॥ ३८ ॥ ६१ ॥
18सारग महला ५ ॥
19हे गुरु ! तुम्हारी संगत में परम सत्य को जाना है।
20करोड़ों योद्धा घूम रहे हैं, कोई उनकी बात नहीं पूछता तो तूने ही प्रभु-दरबार में यश दिलवाया है॥१॥रहाउ॥।
21यह कैसे बताया जाए कि प्राणी का मूल क्या है, किस रूप में दृष्टिगत होता है।
22जब मिट्टी रूपी शरीर में प्राण-ज्योति का आलोक हो गया तो इसे दुर्लभ देह कहा जाने लगा ॥१॥
23हे सद्गुरु ! तुम्हीं से सेवा, जप-तप और सार-तत्व को समझा है।
24नानक का कथन है कि मुझ दासानुदास के मस्तक पर हाथ धरकर तूने मौत की जंजीर काट दी है॥२॥ ३६॥ ६२॥
25सारग महला ५ ॥
26ईश्वर ने सेवक को नाम-स्मरण दिया है।
27हे भाई ! जिसको बचाने वाला खुद परमात्मा है, फिर मनुष्य भला उसका क्या बिगाड़ सकता है।॥१॥रहाउ॥।
28वह स्वयं ही प्रधान है, स्वयं ही पंच है और वह स्वयं ही सेवक के कार्य सम्पन्न करता है।
29उस अन्तर्यामी मालिक ने स्वयं ही सब दुष्टों को खत्म कर दिया है॥ १॥
30उसने स्वयं ही अपने सेवक की प्रतिष्ठा बचाई है और स्वयं ही स्थिरता प्रदान की है।
31हे नानक ! इस तथ्य को जान लो कि युग-युग से प्रभु अपने भक्तों की रक्षा कर रहा है॥ २ ॥ ४० ॥ ६३ ॥
32सारग महला ५ ॥
33हे पिता परमेश्वर ! तू ही मेरा मित्र, हितैषी एवं प्राण है।
34यह आत्मा, शरीर, मन एवं धन सब तुम्हारा है और तुम्हीं ने यह शरीर बनाकर दिया है॥१॥रहाउ॥।
35तुम्हीं ने अनेक प्रकार की चीजें प्रदान की हैं, तुम्हीं ने मान-प्रतिष्ठा प्रदान की है।
36हे अन्तर्यामी ! सर्वदा तू ही हमारी लाज रखता है॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं