सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1214 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! संतों की संगत में मिलकर मैं प्रभु के ध्यान में मग्न रहता हूँ॥२॥ २५॥ ४८ ॥

2सारग महला ५ ॥

3अपने मित्र स्वामी का स्तुतिगान करो,

4किसी अन्य की आशा मत करो, सुखदाता प्रभु का चिंतन करो॥१॥ रहाउ॥।

5जिसके घर सुख ही सुख-मंगल एवं कल्याण है, उसकी शरण में आओ।

6उसे त्याग कर यदि मनुष्य की सेवा करोगे तो लज्जित होकर मरोगे॥१॥

7एक मालिक का आसरा पकड़ा है और गुरु को मिलकर उत्तम बुद्धि प्राप्त हुई है।

8हे नानक ! गुणों का भण्डार प्रभु मिल गया है, जिससे लोगों की मोहताजी समाप्त हो गई है॥२॥ २६ ॥ ४६ ॥

9सारग महला ५ ॥

10मेरे प्रभु की शरण बहुत मजबूत है।

11हे प्रभु ! तेरे बड़प्पन एवं महानता की वजह से किसी अन्य को नजर में नहीं लाता॥१॥रहाउ॥।

12प्रभु ने साथ देकर विकारों के घेरे से निकाल लिया है।

13जब गुरु के पैरों में पड़ा तो उसने मुँह में हरि-नामामृत की औषधि प्रदान की॥१॥

14हे निर्गुणों के दाता ! एक मुख में से तेरी क्या महिमा गा सकता हूँ।

15नानक की विनती है कि अगर बन्धनों को काटकर मुझे अपना बना लो तो अनेक सुख प्राप्त होंगे ॥२॥ २७ ॥ ५० ॥

16सारग महला ५ ॥

17प्रभु का सिमरन करने से दुखों का अंत हो जाता है।

18जीवों को सुख देने वाला जब कृपालु होता है तो सब बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है।॥१॥

19प्रभु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं सूझता, फिर भला किसके पास प्रार्थना की जा सकती है।

20हे मालिक ! जैसे ठीक समझते हो, वैसे ही रखो, हमारा सब कुछ तुम्हारे पास है॥१॥

21अविनाशी प्रभु ने हाथ देकर रक्षा की है, वह सदा जीवन देने वाला है।

22नानक फुरमाते हैं कि उसने यम का फंदा काट दिया है और मन में आनंद उत्पन्न हो गया है॥२॥२८॥५१॥

23सारग महला ५ ॥

24मेरा मन हर वक्त तुझे ही याद करता है।

25हे मेरे पिता प्रभु ! हम दीन बच्चे हैं, जैसे उचित समझो, वैसे पार उतार दो ॥१॥रहाउ॥।

26जब भूख लगती है, तब भोजन मांगते हैं और तुम हमें तृप्त करके सुख ही सुख देते हो।

27जब तुम्हारे साथ रहते हैं, तब आरोग्य होते हैं, लेकिन साथ छूटने से धूल हो जाते हैं।॥१॥

28हे बनाने वाले ! तूने ही हमें बनाया है, तेरे दासों के दास को तेरे सिवा कहाँ रहना है।

29नानक विनती करते हैं कि हे प्रभु ! हमारे लिए यही उपयोगी है कि तेरा नाम न भूले, इससे ही तो जीवन प्राप्त होता है।॥२॥ २६ ॥ ५२ ॥

30सारग महला ५ ॥

31मन से भय-संकट दूर हो गया है,

32प्यारे, लाडले, दयालु परमेश्वर का ही यशोगान किया है।॥१॥रहाउ॥।

33गुरु के वचनों अनुसार जीवन-आचरण अपनाया है और उसकी कृपा से पुनः कहीं ओर नहीं दौड़ता

34इससे सब उपाधियों से रहित हो गया हूँ, सुख समाधि में लीन हूँ और हृदय-घर में भक्तवत्सल प्रभु को पा लिया है॥१॥

35नाद, विनोद एवं आनंदपूर्वक सहजावस्था में तल्लीन हूँ।

36हे नानक ! ईश्वर सर्वस्व है, वह स्वयं ही कर रहा है और स्वयं ही करवाने वाला है॥२॥३०॥५३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं