सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1213 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! मैंने असीम सुख पा लिया है और जन्म-मरण का भय दूर हो गया है॥२॥ २० ॥ ४३ ॥

2सारग महला ५ ॥

3अरे मूर्ख ! तू कहीं और क्यों जाता है?

4मनोहर अमृत तो तेरे संग ही है, फिर भी भूल-भूलकर जहर खा रहा है॥१॥रहाउ॥।

5सुन्दर प्रभु चतुर, अनुपम एवं विधाता है, उससे तेरी थोड़ी-सी भी दिलचस्पी नहीं।

6रे बावले ! माया-मोहिनी ने तेरा मन मोह लिया है और झूठी ठगबूटी प्राप्त कर ली है॥१॥

7जब दुखों को नाश करने वाला दयालु परमेश्वर कृपालु होता है तो संत पुरुषों के संग प्रीति बनी रहती है।

8हे नानक ! इस तरह सर्व सुखों के भण्डार घर में ही प्राप्त हो जाते हैं और आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है ॥२॥ २१।४४ ॥

9सारग महला ५ ॥

10प्रिय ओम् का प्रेम तो पूर्व से चित में मौजूद है।

11हे मेरे सच्चे गुरु ! जब से तूने वचन दिया है, तब से मैंने भक्ति रूपी श्रृंगार कर लिया है॥१॥रहाउ॥।

12हम सदैव भूल करते हैं, परन्तु तुम कभी भूल नहीं करते। हम पतित हैं और तुम पतितों के उद्धारक हो।

13हम तुच्छ वृक्ष हैं परन्तु तुम मलयगिरि की मानिंद महकदार हो, तुम्हारे संग ही रहते हैं, लाज रखना ॥१॥

14तुम गंभीर, सहनशील एवं उपकारी हो, लेकिन हम जीव बेचारे तेरे आगे क्या चीज हैं।

15नानक का कथन है कि जब गुरु ने कृपालु होकर प्रभु से मिला दिया तो मेरी सेज सुखदायक हो गई॥२॥२२॥४५ ॥

16सारग महला ५ ॥

17हे मन ! वह दिन धन्य एवं परवान है।

18वह घड़ी सफल और संयोग सुहावना है, जब सतगुरु के संग ज्ञान-ध्यान की प्राप्ति हुई॥१॥रहाउ॥।

19मेरा सौभाग्य धन्य है, मेरा सुहाग धन्य है, जिसे मान-प्रतिष्ठा देता है, वह भी धन्य है।

20यह तन, घर, धन सब कुछ तुम्हारा है और मैंने इस हृदय को तुझ पर कुर्बान कर दिया है।॥१॥

21एक पल दर्शन करने से लाखों-करोड़ों राज सुखों की प्राप्ति होती है।

22नानक का कथन है कि अगर तू मुँह से कह दे कि सेवक यहाँ बैठना है तो इस सुख का अन्त भी नहीं जाना जा सकता ॥ २ ॥ २३ ॥ ४६ ॥

23सारग महला ५ ॥

24अब मेरा संशय, दुख दूर हो गया है, क्योंकि

25अन्य सब उपाय छोड़कर सतगुरु की शरण में पड़ गया हूँ॥१॥रहाउ॥।

26सर्व सिद्धियां प्राप्त हुई, सभी कार्य पूरे हो गए हैं और अहम् का रोग समाप्त हो गया है।

27गुरु को मिलकर हरिनाम जपा तो पल में करोड़ों अपराध नष्ट हो गए ॥१॥

28गुरु ने कामादिक पाँच दासों को वश में कर दिया है, जिससे मन निश्चल एवं निर्भय हो गया है।

29अब यह न ही कहीं आता जाता है, न ही विचलित होता है। नानक का कथन है कि अब वह स्थिर रहता है ॥२॥ २४ ।४७ ।।

30सारग महला ५ ॥

31मेरा प्रभु लोक-परलोक सदा सहायता करने वाला है।

32वह मनमोहन मेरे प्राणों को प्रिय है, उसका बेशक कितना ही गुणगान किया जाए, कम है॥१॥ रहाउ॥।

33वह खेल खेलाता, लाड लडाता और सर्वदा आनंद प्रदान करता है।

34वह माता-पिता की तरह बालक समझकर परवरिश करता है॥१॥

35उसके बिना पल भर भी रहा नहीं जा सकता, अतः वह कभी भी न भूले।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं