सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1212 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1नानक फुरमाते हैं कि प्रभु के दर्शनों से सुख प्राप्त हो गया है और सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।॥२॥ १५ ॥ ३८ ॥

2सारग महला ५ ॥

3परमात्मा का मार्ग ही चरणों के लिए सुखमय है,

4क्योंकि अन्य मार्गों पर जितनी भी दौड़-धूप होती है, उतने ही दुखों का सामना करना पड़ता है।॥१॥रहाउ॥।

5उसके दर्शन करने से आँखें पवित्र होती हैं, सेवा करने से हाथ पवित्र होते हैं,

6भगवान के बसने से हृदय पवित्र होता है और संतों की चरण धूलि शीश पावन कर देती है॥१॥

7प्रभु का नाम सर्व सुखों का भण्डार है, पर जिसके भाग्य में लिखा होता है, वही इसे पाता है।

8नानक की पूर्ण गुरु से भेंट हुई है, जिससे जीवन स्वाभाविक सुखमय एवं आनंदपूर्वक बीत रहा है॥२॥ १६ ॥ ३६ ॥

9सारग महला ५ ॥

10हरिनाम का ध्यान करो, अन्तिम समय यही साथ निभाता है,

11जहाँ माता-पिता, पुत्र एवं भाई नहीं पहुँचते, वहाँ प्रभु ही रक्षा करता है॥१॥रहाउ॥।

12हृदय रूपी अंधे कुएं में उसने ही परमात्मा का स्मरण किया है, जिसके ललाट पर भाग्य लिखा है।

13उसके सब बन्धन खुल गए हैं, गुरु ने मुक्ति प्रदान की और हर जगह तू ही तू दिखा दिया॥१॥

14हरि-नामामृत का पान करके मन तृप्त हो गया और जीभ इसे चखकर आनंदित हो गई।

15हे नानक ! इस प्रकार मैंने स्वाभाविक सुख पाया और गुरु ने मेरी प्यास बुझा दी॥२॥ १७॥ ४०॥

16सारग महला ५ ॥

17गुरु को मिलकर (इस प्रकार) प्रभु का चिंतन किया तो

18वह दुखनाशक हम पर दयालु कृपालु हो गया, जिस कारण अब कोई दुख-तकलीफ प्रभावित नहीं करती ॥१॥रहाउ॥।

19हम जितनी जीवन-साँसें लेते हैं, उतनी बार हरि के गुण गाते हैं।

20वह पल भर भी नहीं विछुड़ता, एक घड़ी भी नहीं भूलता, जिधर जाता हूँ, सदा साथ रहता है।॥१॥

21मैं उसके चरणों पर बलिहारी हूँ, गुरु दर्शनों पर कुर्बान जाता हूँ।

22हे नानक ! सुखों के सागर प्रभु को पा कर अब मुझे कोई परवाह नहीं ॥२॥ १८ ॥ ४१ ॥

23सारग महला ५ ॥

24मेरे मन को गुरु का उपदेश ही मीठा लगा है,

25हमारा भाग्य खुल गया है, हृदय में आलोक हुआ है और घट-घट में ईश्वर ही दिखाई दे रहा है॥१॥रहाउ॥।

26परब्रह्म परमेश्वर जन्म-मरण से रहित है, स्वयंभू है, सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है।

27हमें अमृतमय प्रभु-नाम प्राप्त हुआ है और हम प्रभु-चरणों पर कुर्बान हैं॥१॥

28सत्संग की चरण-धूल मुँह पर लगाई है, जो समस्त तीर्थों का स्नान करने का फल है।

29हे नानक ! परमात्मा के प्रेम रंग में लाल हो गए हैं और यह पक्का रंग कभी नहीं उतरता॥२॥ १६ ॥ ४२ ॥

30सारग महला ५ ॥

31गुरु ने मुझे परमात्मा का नाम दिया है,

32उसके निमेष वचन से प्रभु दिल में बस गया है और मेरी सारी भूख दूर हो गई है॥१॥रहाउ॥।

33हे मालिक ! तू कृपानिधान है, गुणों का स्वामी और सर्व सुखों का नाथ है।

34मुझे केवल तेरी ही आशा है और अन्य आशाएँ तो सब व्यर्थ हैं।॥१॥

35गुरु ने मेरे माथे पर अपना हाथ रखा और दर्शन करके ऑखें तृप्त हो गई।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं