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गुरु ग्रंथ साहिब 1211 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! मैंने सहज स्वाभाविक हृदय-घर में हरि-भक्ति का भण्डार पा लिया है ॥२॥ १०॥ ३३॥

2सारग महला ५ ॥

3हे प्रभु ! सभी जीव तेरे हैं और तू मुक्तिदाता है।

4तेरी थोड़ी-सी कृपा से जनसंहार समाप्त हो जाता है और करोड़ों ब्रहमांडो का उद्धार हो जाता है।॥१॥रहाउ॥।

5हम प्रार्थना करते हैं, तुझे विनती करते हैं, हर पल तेरी स्मृति में लीन रहते हैं।

6हे दीनों के दुखनाशक ! कृपालु हो जाओ और हाथ देकर निस्तारा करो ॥१॥

7ये जो बादशाह हैं, इनके बारे में भला क्या कहा जाए ? बताओ ये किसको मार सकते हैं?

8नानक विनती करते हैं कि हे सुखदाता ! समूचा जगत तुम्हारा है, रक्षा करो ॥ २ ॥ ११॥ ३४ ॥

9सारग महला ५ ॥

10अब हमने हरिनाम रूपी धन पा लिया है,

11अब हम बेफिक्र हो गए हैं, सारी तृष्णा बुझ गई है और यही भाग्य में लिखा हुआ था ॥१॥रहाउ॥।

12खोजते-खोजते वैराग्यवान हो गया था तो फिर शरीर रूपी गांव में भ्रमण किया।

13गुरु की कृपा से यह सौदा किया और अमूल्य नाम रूपी हीरा मिल गया ॥१॥

14अन्य जितने भी वाणिज्य व्यापार किए जाएँ, इनसे उतने दुख ही नसीब होते हैं।

15नानक का मत है कि गोविन्द भजन का व्यापार करने वाले निर्भय हैं और राम नाम ही उनकी जीवन राशि है ॥२॥ १२॥ ३५ ॥

16सारग महला ५ ॥

17मेरे मन को प्रिय की वाणी ही मीठी लगती है।

18गुरु ने बाँह पकड़ कर प्रभु-सेवा में लगाया है, वह मेरा पति प्रभु सदा दयालु है॥१॥रहाउ॥।

19हे प्रभु ! तू मालिक है, सबका प्रतिपालक है, मैं तेरी पत्नी हूँ और अन्य सभी तेरी दासियाँ हैं।

20तू ही हमारा मान-सम्मान एवं बल है और तेरा नाम मेरा एकमात्र आसरा है॥१॥

21यदि तू सिंहासन पर बैठा देगा तो भी तुम्हारे दास हैं और यदि घास काटने में लगा दोगे तो भी कुछ नहीं बोल सकते।

22नानक का प्रभु परमपुरुष विधाता है, मेरा मालिक असीम व अतुलनीय है॥२॥ १३ ॥ ३६ ॥

23सारग महला ५ ॥

24जिह्म परमात्मा का यशोगान करती हुई शोभान्वित होती है।

25वह पल भर में बनाकर बिगाड़ देता है, उसकी लीला देखकर मन मोहित हो गया है॥१॥रहाउ॥।

26जिस हरिनाम को सुनने से मन खिल उठता है और हृदय का अभिमान एवं दुख नष्ट होता है।

27हे प्रभु ! तुझसे ही हमारी प्रीति बन गई है, सुख पा लिया है और दुख दूर हो गए हैं।॥१॥

28गुरु ने अन्तर्मन से माया के द्वेष को निकाल दिया है, जिससे सब पाप दूर हो गए हैं और मन निर्मल हो गया है।

29हे नानक ! जो सर्वकर्ता, सर्वशक्तिमान है, मैंने उस प्रभु को पा लिया है॥२॥ १४ ॥ ३७ ॥

30सारग महला ५ ॥

31इन नयनों से अद्भुत कौतुक तमाशे को देखा है कि

32ईश्वर सबंसे दूर भी है, सबके समीप भी है, वह अगम्य असीम है और हर हृदंय में बसा हुआ है॥१॥रहाउ॥।

33वह कोई भूल नहीं करता, न ही कोई हुक्म लिखकर देता है और न ही पचास सलाहकारों से कोई विचार-विमर्श करता है।

34वह पल भर में बनाकर तोड़ देता है, वह भक्ति से प्रेम करने वाला और गुणों का भण्डार है॥१॥

35मन रूपी अंधकूप में ज्ञान का दीपक तभी प्रज्वलित होता है, जब गुरु हृदय में प्रकाश करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं