सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 120 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1जब बुद्धि मन की अभिलाषा को नष्ट करके सत्य में समा गई

2तो इस मन ने देख लिया कि यह सृष्टि जन्मती एवं मरती रहती है।

3जो व्यक्ति हमेशा ही सतिगुरु की सेवा करता है, उसका मन अटल हो जाता है और अपने आत्म-स्वरूप में निवास प्राप्त कर लेता है॥३॥

4गुरु के शब्द ने मुझे प्रभु हृदय में ही दिखा दिया है

5और मेरे अन्तर्मन में से माया के मोह को जला दिया है।

6सत्य-प्रभु के दर्शन करके अब मैं उस सत्य-परमात्मा की ही महिमा-स्तुति करता रहता हूँ। वह सत्य गुरु के शब्द द्वारा ही मिलता है॥४॥

7जो व्यक्ति सत्य-परमेश्वर के प्रेम में मग्न हो जाते हैं, उनकी प्रभु में सुरति लग जाती है।

8वह व्यक्ति बड़े भाग्यशाली हैं, जो हरि-नाम का सिमरन करते हैं।

9सत्य-परमेश्वर उन्हें स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है, जो सत्संग में मिलकर सत्य-परमेश्वर का गुणगान करते हैं। ५॥

10परमात्मा लेखे से परे है। उसका लेखा-जोखा हम तब ही पढें, यदि वह किसी लेखे-जोखे में आता हो।

11वह तो अगम्य एवं अगोचर है तथा उसकी सूझ गुरु के शब्द से ही होती है।

12मैं प्रतिदिन सत्य वाणी द्वारा उसकी महिमा-स्तुति करता रहता हूँ तथा अन्य कोई भी उसका मूल्यांकन नहीं कर सकता ॥६॥

13कई विद्वान ग्रंथ पढ़-पढ़कर थक चुके हैं परन्तु उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं हुई।

14वे तृष्णाग्नि में ही जलते रहे और प्रभु बारे कोई ज्ञान नहीं मिला।

15वह जीवन भर विष रूप माया ही खरीदते रहे और उन्हें विष रूप मोह-माया की प्यास ही लगी रही। अतः वह झूठ बोल-बोलकर विष रूप माया ही सेवन करते रहे॥ | ७ ॥

16जिस व्यक्ति ने गुरु की कृपा से एक परमेश्वर को जाना है,

17उसका मन माया के मोह को नष्ट करके सत्य में समा गया है।

18हे नानक ! जिसके मन में एक परमात्मा ही प्रवृत हो रहा है, गुरु की कृपा से वहीं भगवान को प्राप्त करता है ॥८॥१७ ॥१८ ॥

19माझ महला ३ ॥

20हे प्रभु ! जगत् में विभिन्न वर्ण एवं रूप वाले जितने भी जीव है, वह तेरे ही रूप हैं और तू स्वयं ही उन में प्रवृत्त हो रहा है।

21ये समस्त जीव बार-बार जन्मते एवं मरते रहते हैं और इन्हें जन्म-मरण के अधिकतर चक्र पड़े रहते हैं।

22लेकिन हे ईश्वर ! एक तू ही अमर, अगम्य एवं अपरंपार है और इस तथ्य का ज्ञान जीवों को तू गुरु की मति द्वारा ही देता है।॥१॥

23मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो राम नाम को अपने हृदय में बसाते हैं।

24प्रभु का कोई भी रूप-रंग आकार-प्रकार अथवा वर्ण नहीं है। वह स्वयं ही गुरु की मति द्वारा जीवों को ज्ञान प्रदान करता है॥१॥ रहाउ ॥

25समस्त जीवों में एक प्रभु की ही ज्योति विद्यमान है परन्तु इस भेद को कोई विरला ही जानता है।

26सतिगुरु की सेवा करने से यह ज्योति मनुष्य के हृदय में प्रगट हो जाती है अर्थात् उसे अपने ह्रदय में ही प्रकाश के प्रत्यक्ष दर्शन हो जाते हैं।

27भगवान अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं एवं मनुष्य की ज्योति प्रभु की परम ज्योति में विलीन हो जाती है।॥२॥

28सारा संसार तृष्णा की अग्नि में जल रहा है।

29जीवों में लोभ, अभिमान तथा अहंकार अधिकतर बढ़ रहा है।

30जीब बार-बार मरता और जन्म लेता है तथा अपनी प्रतिष्ठा गंवाता है। इस तरह वह अपना अनमोल जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है॥३॥

31कोई विरला पुरुष ही गुरु के शब्द को समझता है।

32जब मनुष्य अपने अहंकार को नष्ट कर देता है, तब उसको तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है।

33यद्यपि मनुष्य मिथ्या-तत्व की परख उपरांत मृत्यु प्राप्त करे तो इसके पश्चात मृत्यु नहीं होती और वह सहज ही सत्य-परमात्मा में लीन हो जाता है॥४॥

34तब वह अपना मन मोह-माया में नहीं लगाता और

35गुरु की वाणी में सदैव लीन हुआ रहता है।

36वह सत्य परमेश्वर की ही महिमा-स्तुति करता है जो सर्वव्यापक है। उसे यूं प्रतीत होता है कि एक सत्य-परमेश्वर ही सब में शोभायमान हो रहा है॥५॥

37मैं सत्य-परमेश्वर की ही सराहना करता रहता हूँ और उसे ही सदैव प्रत्यक्ष समझता हूँ।

38गुरु के शब्द द्वारा मुझे प्रभु सारे जगत् में ही विद्यमान लगता है।

39सत्य-परमेश्वर के गुरु की कृपा से ही दर्शन होते हैं और सत्य-परमेश्वर से ही सुख प्राप्त होता है॥६॥

40सत्य-परमेश्वर प्रत्येक जीव के मन में समाया हुआ है।

41वह सत्य-परमेश्वर सदैव अमर है और जन्म-मरण में कभी नहीं आता।

42जो मन सत्य-परमेश्वर के साथ प्रेम करता है, वह निर्मल हो जाता है और गुरु की मति द्वारा सत्य में ही समाया रहता है।॥७ ॥

43मैं तो एक परमेश्वर की ही सराहना करता रहता हूँ तथा किसी अन्य की पूजा नहीं करता।

44उसकी सेवा करने से सदैव ही सुख मिलता रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं