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गुरु ग्रंथ साहिब 1206 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1खोजते-खोजते यही निष्कर्ष पाया है कि परमेश्वर का नाम ही सर्व सुख प्रदान करने वाला है।

2हे नानक ! यह उसको ही प्राप्त होता है, जिसका उत्तम भाग्य होता है।॥४॥ ११ ॥

3सारग महला ५ ॥

4हर पल भगवान की महिमागान करनी चाहिए,

5इससे सब पदार्थ, सर्व सुख, सिद्धियाँ एवं मनवांछित फल की प्राप्ति होती है॥१॥रहाउ॥।

6हे सज्जनो ! आओ, प्राणों को सुख देने वाले, अविनाशी प्रभु की आराधना करें।

7अनाथों का नाथ, दीन-दुखियों के दुख नाश करने वाला दिल में ही बसा हुआ है॥१॥

8भाग्यशाली पुरुष प्रभु के गुण गाता, उसका यश सुनता-सुनाता है और श्रद्धापूर्वक हरि रस का पान करता है।

9यदि राम नाम में ध्यान लगाया जाए तो तन से सभी कलह-कलेश मिट जाते हैं।॥२॥

10काम, क्रोध, झूठ एवं निंदा को छोड़कर परमेश्वर का स्मरण करने से सब बन्धनों से छुटकारा हो जाता है।

11गुरु की कृपा से मोह में मग्न, अहंकार में अंधा हुआ जीव ममत्व इत्यादि सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है॥३॥

12हे परब्रह्म स्वामी ! तू सर्वशक्तिमान है, अपने भक्त पर कृपा करो।

13नानक का कथन है कि मालिक सब में मौजूद है और वह प्रभु हमारे निकट ही है॥४ ॥ १२ ॥

14सारग महला ५ ॥

15मैं गुरुदेव के चरणों पर कुर्बान जाता हूँ,

16जिनके साथ परब्रह्म का ध्यान होता है और उनका उपदेश हमारी मुक्ति करता है॥१॥रहाउ॥।

17जो भी संतों की शरण में आता है, उसके दुख, रोग भय सब नाश हो जाते हैं।

18ये स्वयं तो परमात्मा का जाप करते ही हैं, अन्य लोगों को भी नाम का ही जाप करवाते हैं।

19वे इतने समर्थ हैं कि जीव को संसार-सागर से पार उतार देते हैं ॥१॥

20जिनका मंत्र सब संदेह समाप्त कर देता है और खाली को पूर्णतया भर देता है, उन ईश्वर-भक्तों की आज्ञा मानने से पुनः गर्भ योनि में नहीं आना पड़ता ॥२॥

21जो भक्तों की सेवा करते हैं, उनके गुण गाते हैं, उनके जन्म-मरण के दुख कट जाते हैं।

22जिन पर ईश्वर कृपालु होता है, ऐसे लोग प्रभु भजन करते हुए अमर हो जाते हैं।॥३॥

23जो हरि रस से तृप्त होकर सहजावस्था में लीन रहते हैं, उनकी कीर्ति मुँह से वर्णन नहीं की जा सकती।

24हे नानक ! गुरु की कृपा से प्रभु नाम का स्मरण करके संतुष्ट हो गए हैं और प्रभु का निरंतर जाप करके उनकी मुक्ति हो गई है॥४॥ १३॥

25सारग महला ५ ॥

26अरी सखी ! मैंने गुणों के भण्डार निरंकार का ही मंगलगान किया है।

27वे संयोग, दिन एवं अवसर सब भले हैं, जब प्रभु को प्रसन्न किया॥१॥रहाउ॥।

28मेरा माथा संत पुरुषों के चरणों में नत है,

29उन्होंने हमारे माथे पर अपना (आशीष) हाथ रख दिया है॥१॥

30जब से साधुओं के मंत्र (उपदेश) का अभ्यास किया है,

31हमारा तीन गुणों से छुटकारा हो गया है॥२॥

32भक्तों के दर्शन पाकर नयनों में प्रभु का रंग लग गया है और

33लोभ, मोह एवं भ्रम समाप्त हो गए हैं।॥३॥

34हे नानक ! अब सहज सुख एवं आनंद प्राप्त हुआ है,

35अज्ञान की दीवार को खोलकर परमानंद मिला है॥४॥ १४॥

36सारग महला ५ घरु २

37ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

38मैं अपने दिल का दर्द कैसे बताऊँ।

39प्यारे प्रभु के दर्शन की तीव्र लालसा एवं प्रेम बना हुआ है और मन अनेक प्रकार से महत्वाकांक्षी है॥१॥रहाउ॥।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं