सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1205 · Raag Saarang · Guru Arjan Dev Ji

1मैं पैरों से मालिक के मार्ग पर चलता हूँ और जिह्म से प्रभु के गुण गाता हूँ॥२॥

2मैं अपनी आँखों से सर्व मंगल रूप देखता हूँ, संतों ने मेरा जीवन बदल दिया है।

3मैंने हरिनाम रूपी अमूल्य रत्न पा लिया है, जिसे अब बिल्कुल नहीं छोड़ सकता ॥३॥

4परमात्मा की क्या उपमा वर्णन करूँ, कौन-सी महिमा एवं क्या गुण गाऊँ कि वह खुश हो जाए।

5हे नानक ! दीनों पर दया करने वाला प्रभु सदैव अपने दासों पर कृपालु है॥४॥८॥

6सारग महला ५ ॥

7वह सुख किस तरह बताकर सुनाऊँ,

8प्रभु के दर्शनों से खुशियाँ एवं उल्लास उत्पन्न हो जाता है और मन उसके ही गुण गाता है॥१॥रहाउ॥।

9कृपालु प्रभु की अद्भुत लीलाओं को देखकर चकित हो गई हूँ।

10ज्यों गूगा व्यक्ति मिठाई खा कर अपनी खुशी का इजहार करता है, वैसे ही मैंने अमूल्य नाम अमृत का पान किया है।॥१॥

11जैसे प्राण-वायु को शरीर में बाँध कर रखा हुआ है और उसके आने जाने की खबर नहीं होती,

12वैसे ही जिसके हृदय में परम-सत्य का प्रकाश होता है, उसकी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता ॥२ ॥

13अन्य जितने भी उपाय हैं, सबका इस्तेमाल कर लिया है।

14मेरा प्रभु नैसर्गिक हृदय घर में प्रगट हो गया है, ज्यों अगम को जानने का बल मिला है॥३॥

15वह निर्गुण निराकार, अविनाशी, अतुल्य है, उसकी महिमा की तुलना नहीं की जा सकती।

16हे नानक ! जिसने अजरावस्था को प्राप्त कर लिया है, उसी को सफलता प्राप्त हुई है॥ ४ ॥६॥

17सारग महला ५ ॥

18विलासी पुरुष दिन-रात व्यर्थ ही गुजार देता है,

19वह गोविंद का भजन नहीं करता और अहंकार में लीन रहकर अपनी जीवन बाजी को जुए में हार देता है॥१॥रहाउ॥।

20वह अमूल्य प्रभु-नाम से प्रेम नहीं करता और पराई निंदा को ही लाभदायक मानता है।

21वह तिनकों को संवार कर झोंपड़ी तैयार करता है और द्वार पर माया की अग्नि जला लेता है॥१॥

22वह सिर पर मिट्टी की पोटली उठा लेता है और अमृत को मन से निकाल देता है।

23वह काजल में पड़े हुए वस्त्रों को पहनता है और बार-बार उनको झाड़ता है॥ २ ॥

24जिस पेड़ की डाल पर खड़ा होता है, उस पेड़ को काट देता है और विषय-विकारों का सेवन कर मुस्कुराता है।

25परिणामस्वरूप सिर के बल गिरता जाता है और रसातल में पड़ता है॥३॥

26वह सज्जन पुरुषों से वैर करता है, लेकिन वह मूर्ख अपनी कोशिश में सफल नहीं होता।

27हे नानक ! निराकार परब्रह्म सदैव भक्तजनों की रक्षा करने वाला है॥ ४ ॥ १० ॥

28सारग महला ५ ॥

29अन्य सभी लोग भूले हुए हैं और उन्होंने सत्य को नहीं जाना।

30जिसके हृदय में एक शुद्ध अक्षर ऑकार बस गया है, उसने वेदों के सार तत्व को पहचान लिया है॥ १॥ रहाउ ॥

31जितना भी प्रवृति-मार्ग अपनाया जाता है, उतना ही लोकाचार है।

32जब तक ह्रदय में सत्य का आलोक नहीं होता, तब तक ज्ञान का घोर अंधेरा ही बना रहता है।॥ १॥

33जिस प्रकार धरती पर अनेक प्रकार से सिंचाई की जाए परन्तु बीज बोए बिना खेती नहीं जमती।

34वैसे ही राम नाम के स्मरण बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही अभिमान समाप्त होता है।॥२॥

35अगर सख्त मेहनत करके जल को बिलोया जाए, तो भी मक्खन प्राप्त नहीं होता।

36इसी प्रकार गुरु से साक्षात्कार के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही परमेश्वर मिलता है।॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं