सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1202 · Raag Saarang

1सारग महला ४ पड़ताल ॥

2हे मन ! गोविंद का भजन कर, वह गुणों का भण्डार है, सम्पूर्ण सृष्टि का मालिक है, वह परमपुरुष अनश्वरं है, अतः उसका नामोच्चारण कर ॥१॥रहाउ॥।

3परमात्मा का नाम अमृतमय है, वही इसका पान करता है, जिसे ईश्वर स्वयं पिलाता है।

4दयालु परमेश्वर दया करके जिसका सतगुरु से साक्षात्कार करवा देता है, वही जिज्ञासु हरिनामामृत चखता है॥१॥

5जो भक्त सदा मेरे हरि की उपासना करते हैं, उनका दुख, भ्रम एवं भय सब दूर हो जाता है।

6नानक प्रभु का नाम जपकर जीवन पाता है, ज्यों चातक स्वाति बूंद पाकर तृप्त होता है॥२॥५॥१२॥

7सारग महला ४ ॥

8हे मन ! श्री राम का जाप कर लो,

9सम्पूर्ण सृष्टि में ‘राम राम' बसा हुआ है।

10राम सदा सत्य है, शाश्वत स्वरूप है।

11हे भाई ! सदैव राम राम बोलो, वह सर्वव्यापक है॥१॥रहाउ॥।

12केवल राम ही सम्पूर्ण विश्व का नियंता है, सर्वशक्तिमान है, सृष्टि का कर्ता है, विश्व के कण-कण में केवल राम ही व्याप्त है।

13जिस पर मेरा राम कृपा करता है, वही भक्त राम नाम की भक्ति में लगन लगाता है॥१॥

14हे सज्जनो ! राम नाम की कीर्ति देखो ! जो घोर कलियुग में भी भक्तजनों की प्रतिष्ठा बचाता है।

15नानक का कथन है कि मेरे राम ने दास (नानक) का साथ दिया है, जिससे सभी दुश्मन एवं दुख भाग गए हैं।॥२॥६॥ १३ ॥

16सारंग महला ५ चउपदे घरु १

17ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

18मैं प्रेम की मूर्ति सतगुरु पर बलिहारी जाता हूँ।

19ज्यों चातक को स्वाति जल की प्यास होती है, वैसे ही मेरे अन्तर्मन में गुरु दर्शन की तीव्र लालसा है, कब दर्शन पाऊँगा ॥१॥रहाउ॥।

20परमात्मा भक्तवत्सल है, बेसहारों का सहारा है, सबका पोषक है।

21जिस प्राणी को कोई शरण नहीं देता है, उसे तू ही आसरा देता है॥१॥

22हे परमेश्वर ! तू ही बेसहारा लोगों का सहारा है, निर्बल गरीब व्यक्तियों का तू ही बल है और बेघर लोगों का तू ही घर है।

23दसों दिशाओं में जिधर भी जाता हूँ, वहां तू ही साथ देता है और सदा तेरा कीर्तिगान करता हूँ॥२॥

24एक से ही तू लाखों हो जाता है और लाखों से ही एक हो जाता है, तेरी शक्ति एवं महत्ता का मैं वर्णन नहीं कर सकता।

25तू बे-अन्त है, तेरा रहस्य नहीं पाया जा सकता और दृष्टिमान समूचा विश्व-प्रसार तेरी लीला है॥३॥

26साधु सज्जनों की संगत, साधुओं से गोष्ठी एवं साधु पुरुषों के संग प्रभु से प्रेम बना हुआ है।

27नानक की विनती है कि गुरु से उपदेश पाया है, हे प्रभु! दर्शन दो, मन में यही चाव है॥४॥१॥

28सारग महला ५ ॥

29ईश्वर अन्तर्यामी है, मन की हर भावना को जानने वाला है।

30बुराई करते हुए मनुष्य लोगों से छिपा सकता है, लेकिन वायु की मानिंद ईश्वर हर जगह पर साक्षी है।॥१॥रहाउ॥।

31कोई मनुष्य अपना नाम वैष्णव बताता है, वह (यज्ञ, अध्यापन, अध्ययन दान इत्यादि) छ: कर्म करता है, फिर भी उसके अन्तर्मन में लोभ की जूठन विद्यमान रहती है।

32जो संत सभा की निंदा करते हैं, ऐसे सभी लोग अज्ञान में डूबे रहते हैं।॥१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं