सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1201 · Raag Saarang

1सारंग महला ४ ॥

2हे मन ! नारायण का जाप करो, वह श्रीहरि सभी देवताओं का भी पूज्य देव है, वह श्री राम ही मेरा प्रियतम है॥१॥रहाउ॥।

3जिस घर में परमात्मा का गुणगान होता है, राम का यशोगान होता है, उस घर में अनगिनत खुशियाँ एवं आनंद हो जाता है, अहोभाग्य जाग जाते हैं।

4उन भक्तों के सभी पाप, दोष, रोग, काम-क्रोध, लोभ, मोह एवं अभिमान दूर हो जाता है। ईश्वर उन भक्तों के कामादिक पांच विकारों को मारकर निकाल देता है॥१॥

5ईश्वर के भक्त, साधु पुरुष राम नाम ही बोलते हैं और उस जगदीश का ही जाप करते हैं। ईश्वर के भक्त मन, वचन एवं कर्म से हरि की आराधना करते हैं।

6वे राम नाम बोलकर अपने सब पापों का निवारण करते हैं।

7वे नित्य जागृत रहते हैं और सदा जगदीश्वर को जपकर आनंद पाते हैं।

8वे घर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं मनवांछित फल पाते हैं। हे नानक ! भक्तजन ईश्वर की भक्ति में ही लीन रहते हैं।॥२॥ २ ॥६॥

9सारग महला ४ ॥

10हे मन ! माधव, मधुसूदन, श्रीहरि, श्रीरंग, सत्यस्वरूप परमेश्वर, अन्तर्यामी प्रभु का भजन करो।

11वह सब दुखों को नष्ट करने वाला है, सब सुख प्रदान करने वाला है, उस प्रियतम हरि के गुण गाओ ॥१॥रहाउ॥।

12ईश्वर सब में व्याप्त है, हर शरीर में रहता है, समुद्र, पृथ्वी में वही रहता है, देश-देशान्तर सब में बसा हुआ है। मुझे तो हरि दर्शन का चाव है।

13यदि कोई संत, ईश्वर का भक्त, मेरा प्रियतम संत मेरे पास आए और मुझे सच्चा मार्ग दिखाए तो

14उस महापुरुष के मल-मलकर मैं पैर धोता रहूँ॥१॥

15ईश्वर के भक्त को पूर्ण श्रद्धा से ही ईश्वर मिला है और गुरु के सान्निध्य में उसी से साक्षात्कार हुआ है।

16जब मुझे ईश्वर के दर्शन हुए तो मेरे मन तन में आनंद हो गया।

17नानक का कथन है कि जब मुझ पर जगदीश्वर श्रीहरि की कृपा हुई तो

18मैंने दिन-रात हरि नाम का जाप किया है॥२॥३॥ १० ॥

19सारग महला ४ ॥

20हे मन ! ईश्वर का भजन करो, वह निर्भय है,

21सदा शाश्वत-स्वरूप है,

22वह वैर-भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति अमर है,

23वह जन्म-मरण से परे है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है,

24वह भोजन पानी से रहित है। हे मेरे मन ! सदैव उस निरंकार का चिंतन करो ॥१॥रहाउ॥।

25परमात्मा के दर्शन के लिए तेंतीस करोड़ देवता, सिद्ध, ब्रह्मचारी, योगी, तटों-तीर्थों की यात्रा करते एवं व्रत-उपवास रखते हैं।

26उन भक्तों की सेवा सफल होती है, जिन पर ईश्वर कृपालु होता है॥१॥

27ईश्वर के वही संत एवं उत्तम भक्त भले हैं, जो प्रभु को प्रिय लगते हैं।

28हे नानक ! मेरा स्वामी जिनका साथ देता है, उनकी ही लाज बचाता है॥२॥४॥ ११ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं