सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1200 · Raag Saarang · Guru Raam Daas Ji

1कानों से दिन-रात परमात्मा का भजन कीर्तन सुनता हूँ और हृदय में प्रभु ही अच्छा लगता है॥३॥

2जब गुरु ने कामादिक पांच विकारों को वशीभूत कर दिया तो नाम में तल्लीन हो गया।

3हे नानक ! ईश्वर की कृपा हुई तो राम नाम के सुमिरन (स्मरण) में लीन हो गया ॥४॥५॥

4सारग महला ४ ॥

5हे मन ! राम नाम का जाप एवं पठन करो, यही सार है।

6राम नाम के बिना कोई स्थिर नहीं, अन्य सब विस्तार निष्फल हैं॥ १॥ रहाउ ॥

7हे पगले ! संसार से क्या लिया जाए और क्या छोड़ा जाए, जो भी दिखाई दे रहा है, सब धूल समान है।

8जिस संपति रूपी विष को तुम अपना समझते हो, उसे छोड़ दो, क्योंकि ये पापों का भार है॥१॥

9तिल तिल हर पल जीवन अवधि घटती जा रही है, लेकिन गंवार मनुष्य इस बात को समझता नहीं।

10मायावी मनुष्य का यही आचरण है कि वह वही कुछ करता है, जो साथ नहीं जाता॥२॥

11हे बावले ! अगर संत पुरुषों की संगत में मिलकर रहेगा तो ही मोक्ष प्राप्त होगा।

12बेशक वेदों का चिंतन कर लो, वे भी हामी भरते हैं कि सत्संग के बिना किसी ने भी सुख नहीं पाया है॥३॥

13राजा-महाराजा सब लोग झूठ के प्रसार को छोड़कर चलायमान हैं।

14नानक फुरमाते हैं कि संत पुरुष सदा निश्चल हैं, जिनके पास राम नाम का आसरा है॥ ४ ॥ ६ ॥

15सारग महला ४ घरु ३ दुपदा

16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

17हे पुत्र ! अपने पिता से क्यों झगड़ा कर रहे हो ?

18जिन्होंने जन्म देकर तुम्हें बड़ा किया है, उनके साथ झगड़ा करना पाप है॥१॥रहाउ॥।

19जिस धन का तुम अहंकार करते हो, वह धन किसी का अपना नहीं बना है।

20जहर रूपी यह धन पल में छोड़ जाता है तो बाद में पछतावा होता है॥१॥

21जो प्रभु तुम्हारा स्वामी है, उसका ही जाप करो।

22नानक तुमको उपदेश करते हैं, यदि इसे ध्यानपूर्वक सुनोगे तो तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा ॥२॥१॥७॥ [वर्णनीय है कि वावा पृथी घंद गुरु रामदास जी के बड़े सुपुत्र थे। जब गुरु जी ने अपने छोटे सुपुत्र गुरु अर्जुन देव जी को गुरुगही सौंपी थी तो बाबा पृथी घंद ने बड़ा विरोध किया था।]

23सारग महला ४ घरु ५ दुपदे पड़ताल

24ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

25हे मन ! जगत के स्वामी, जीवनदाता, जगदीश्वर का जाप करो, उस प्यारे प्रभु से प्रेम लगा हुआ है और हर दिन हर रात उसी का मुझे आसरा है॥१॥रहाउ॥।

26ईश्वर की अनेकानेक महिमाएँ हैं। शुकदेव, नारद एवं ब्रह्मा इत्यादि उसके ही गुण गाते हैं। हे स्वामी ! तेरे उपकारों को गिना नहीं जा सकता।

27हे हरि ! तू बेअन्त है, बेअन्त है। हे स्वामी ! तू स्वयं ही अपनी विशेषताओं को जानता है॥१॥

28जो ईश्वर के निकट ही बसते हैं, वे साधु पुरुष ईश्वर के परम भक्त हैं।

29नानक फुरमाते हैं कि ईश्वर के भक्त ईश्वर के साथ-यूं मिल जाते हैं, जैसे पानी पानी में मिल जाता है॥२॥१॥८॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं