गुरु ग्रंथ साहिब 11 · So Purakh · Guru Raam Daas Ji
1सर्वव्यापक निरंकार समस्त प्राणियों के हृदय में अभेद समा रहा है।
2संसार में कोई दाता बना हुआ है, कोई भिक्षु का रूप लिया हुआ है, हे परमात्मा ! यह सब तुम्हारा ही आश्चर्यजनक कौतुक है।
3तुम स्वयं ही देने वाले हो और स्वयं ही भोक्ता हो, तुम्हारे बिना में किसी अन्य को नहीं जानता।
4तुम पारब्रह्म हो, तुम तीनों लोकों में अंतरहित हो, मैं तुम्हारे गुणों को मुख से कथन कैसे करूं।
5सतगुरु जी कथन करते हैं कि जो जीव आप का अंतर्मन से सिमरन करते हैं, सेवा-भाव से समर्पित होते हैं उन पर मैं न्योछावर होता हूँ॥ २॥
6हे निरंकार ! जो आपका मन व वाणी द्वारा ध्यान करते हैं, वो मानव-जीव युगों-युगों तक सुखों का भोग करते हैं।
7जिन्होंने आपका सिमरन किया है वे इस संसार से मुक्ति प्राप्त करते हैं और उनका यम-पाश टूट जाता है।
8जिन्होंने भय से मुक्त होकर उस अभय स्वरूप अकाल-पुरुष का ध्यान किया है उनके जीवन का समस्त (जन्म-मरण व यमादि का) भय वह समाप्त कर देता है।
9जिन्होंने निरंकार का चिन्तन किया, सेवा-भाव से उस में लीन हुए, वे तुम्हारे दुखहर्ता रूप में ही विलीन हो गए।
10हे नानक ! जिन्होंने नारायण स्वरूप निरंकार का सिमरन किया, वे धन्य ही धन्य हैं, मैं उन पर कुर्बान होता हूँII ३ ॥
11हे अनंत स्वरूप ! तेरी भक्ति के खजाने भक्तों के हृदय में अनंतानंत भरे हुए हैं।
12तेरे भक्त तीनों काल तेरी प्रशंसा के गीत गाते हैं कि हे परमेश्वर ! तू अनेकानेक व अनंत स्वरूप हैं।
13संसार में तेरी नाना प्रकार से आराधना और जप-तपादि द्वारा साधना की जाती है।
14अनेकानेक ऋषि-मुनि व विद्वान कई तरह के शास्त्र, स्मृतियों का अध्ययन करके तथा षट्-कर्म, यज्ञादि धर्म कार्यों द्वारा तुम्हारा स्तुति-गान करते हैं।
15हे नानक ! वे समस्त श्रद्धालु भक्त संसार में भले हैं जो निरंकार को अच्छे लगते हैंII ४II
16हे अकाल पुरुष ! तुम अपरिमेय पारब्रह्म अनन्त स्वरूप हो, तुम्हारे समान अन्य कोई भी नहीं है।
17युगों युगों से तुम एक हो, सदा सर्वदा तुम अद्वितीय स्वरूप हो और तुम ही निश्चल रचयिता हो।
18जो तुम्हें भला लगता है वही घटित होता है, जो तुम स्वेच्छा से करते हो वही कार्य होता है।
19तुमने स्वयं ही इस सृष्टि की रचना की है और स्वयं ही रच कर उसका संहार भी करता है।
20हे नानक ! मैं उस स्रष्टा प्रभु का गुणगान करता हूँ, जो समस्त सृष्टि का सृजक है अथवा जो समस्त जीवों के अन्तर्मन का ज्ञाता हैII ५II १II
21आसा महला ४ ॥
22हे निरंकार ! तुम ही सृजनहार हो, सत्यस्वरूप हो और मेरे मालिक हो।
23जो तुम्हें भला लगता है वही होता है, जो तुम देते हो वही मैं प्राप्त करता हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
24सम्पूर्ण सृष्टि तुम्हारी पैदा की हुई है, तुम्हें सभी जीवों ने स्मरण किया है।
25किंतु जिन पर तुम्हारी दया होती है, उन्होंने ही तुम्हारा नाम रूपी रत्न-पदार्थ प्राप्त किया है।
26यह नाम-रत्न श्रेष्ठ साधक पा जाते हैं और स्वेच्छाचारी मनुष्य इसे गंवा बैठते हैं।
27तुम स्वयं ही विच्छन्न करते हो और स्वयं ही सम्मिलित करते हो। ॥ १॥
28हे परमेश्वर ! तुम नदी हो, सारा प्रपंच तुझ में ही तरंग रूप है।
29तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं है।
30सृष्टि के सभी छोटे-बड़े जीव तुम्हारा ही कौतुक है।
31वियोगी कर्मों के कारण जो तुम में लीन था, वह विछुड़ गया और संयोग के कारण विछुड़ा हुआ तुम से आ मिला है; अर्थात् तुम्हारी कृपा से जिन्हें सत्संगति प्राप्त नहीं हुई वे तुम से अलग हो गए और जिन्हें संतों का संग मिल गया उन्हें तुम्हारी भक्ति प्राप्त हो गई॥ २॥
32हे परमात्मा ! जिसे तुम गुरु द्वारा ज्ञान प्रदान करते हो वही इस विधि को जान सकता है। फिर वही सदैव तेरे गुणों का व्याख्यान करता है।
33फिर वही सदैव तेरे गुणों का व्याख्यान करता है।
34जिन्होंने उस अकाल पुरुष का सिमरन किया है, उन्होंने आत्मिक सुखों की प्राप्ति की है।
35फिर वह परम पुरुष सरलता से ही प्रभु-नाम में समाहित हो जाता है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं