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गुरु ग्रंथ साहिब 119 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1हे भगवान ! बुरे एवं भले जीव तूने ही पैदा किए हैं।

2समस्त लोगों के अच्छे एवं दुष्कर्मो की परख तू स्वयं ही करता है।

3भले जीवों को तुम अपने भक्ति-कोष में डाल देते हो परन्तु बुरे जीवों को तुम भ्रम में फँसाकर कुमार्ग लगा देते हो।॥६॥

4हे भगवान ! मैं तेरे दर्शन कैसे करूं ? और कैसे तेरी महिमा-स्तुति करूं ?

5गुरु की कृपा से ही मैं वाणी द्वारा तेरी ही महिमा कर सकता हूँ!

6हे प्रभु ! तेरी इच्छा से ही नाम-अमृत की वर्षा होती है और तू अपनी इच्छानुसार ही जीव को नाम-अमृत का पान करवाता है॥७॥

7हे भगवान ! तेरा नाम अमृत है और तेरी वाणी भी अमृत है।

8सतिगुरु की सेवा करने से ही तेरी वाणी मनुष्य के हृदय में समा जाती है।

9हे नानक ! अमृत-नाम सदैव ही सुखदाता है और नाम रूपी अमृत का पान करने से मनुष्य की तमाम भूख मिट जाती है।॥८॥१५॥१६॥

10माझ महला ३ ॥

11नाम-अमृत सहज-स्वभाव ही बरस रहा है।

12गुरु के माध्यम से इसे कोई विरला पुरुष ही प्राप्त करता है।

13नाम-अमृत का पान करने वाले सदैव तृप्त रहते हैं। अपनी दया करके प्रभु उनकी प्यास बुझा देता है॥१ ॥

14मैं उन पर न्यौछावर हूँ, जिन्हें गुरु जी नाम अमृत का पान करवाते हैं।

15नाम अमृत को चखकर जिव्हा सदैव प्रभु की प्रीति में लीन रहती है और सहज ही हरि प्रभु का यशोगान करती है॥१॥ रहाउ॥

16गुरु की कृपा से कोई विरला प्राणी ही सहज अवस्था को प्राप्त करता है

17और अपनी दुविधा का नाश करके एक ईश्वर के साथ सुरति लगाता है।

18जब परमात्मा दया-दृष्टि करता है तो प्राणी उस प्रभु के गुण गायन करता है और उसकी दया से सत्य में लीन हो जाता है।॥२॥

19हे मेरे हरि-प्रभु ! तेरी कृपा-दृष्टि समस्त जीवों पर है

20किन्तु यह (कृपा-दृष्टि) किसी पर कम और किसी पर अधिकतर है।

21आपके सिवाय कुछ भी नहीं होता। इस बात का ज्ञान मनुष्य को गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होता है॥३॥

22गुरमुख इस तथ्य पर चिंतन करते हैं कि

23तेरे भण्डार नाम-अमृत से परिपूर्ण हैं।

24सतिगुरु की सेवा करने के अलावा कोई भी नाम अमृत को प्राप्त नहीं कर सकता। यह तो गुरु की दया से ही मिलता है।॥४॥

25जो पुरुष सतिगुरु की सेवा करता है, वह शोभनीय है।

26प्रभु का अमृत-नाम मनुष्य के मन एवं ह्रदय को मोहित कर देता है।

27जिनके मन एवं तन अमृत वाणी में मग्न हो जाते हैं, प्रभु उन्हें सहज ही अपना अमृत-नाम सुनाता है॥५॥

28स्वेच्छाचारी जीव भटका हुआ है। और मोह-माया में फँसकर नष्ट हो जाता है।

29प्रभु नाम का वह जाप नहीं करता और माया रूपी विष सेवन करके प्राण त्याग देता है।

30रात-दिन उसका बसेरा सदैव विष्टा रूपी विषय-विकारों में रहता है। गुरु की सेवा के बिना वह अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है॥६॥

31जिसको प्रभु स्वयं पिलाता है वही नाम अमृत का पान करता है।

32गुरु की कृपा से सहज ही वह परमात्मा में सुरति लगाता है।

33पूर्ण परमेश्वर स्वयं ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। गुरु की मति द्वारा वह प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ७॥

34वह निरंजन प्रभु सब कुछ अपने आप से ही है।

35जिस प्रभु ने सृष्टि की रचना की है, वह स्वयं ही इसका विनाश भी करता है।

36हे नानक ! तुम सदैव ही प्रभु नाम का सिमरन करो। ऐसे तुम सहज ही परमात्मा में विलीन हो जाओगे॥८ ॥१६॥१७॥

37माझ महला ३ ॥

38हे ईश्वर ! जो तुझे अच्छे लगते हैं, वहीं सत्य (नाम) में लगते हैं।

39वह सहज-स्वभाव सदैव ही परमेश्वर की सेवा भक्ति करते हैं।

40वह सत्य-नाम द्वारा सत्य-प्रभु की सराहना करते हैं और सत्य-नाम उन्हें सत्य से मिला देता है।॥१॥

41मैं उन पर तन-मन से कुर्बान हूँ, जो सत्य परमेश्वर की सराहना करते हैं।

42जो सत्य परमेश्वर का ध्यान करते हैं, वह सत्य में ही रंग जाते हैं और सत्यवादी बन कर सत्य में लीन हो जाते हैं।॥१॥ रहाउ॥

43मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ, सत्य परमात्मा मुझे सर्वत्र दिखाई देता है।

44वह गुरु की कृपा से मनुष्य के मन में आकर निवास करता है।

45फिर उस मनुष्य का शरीर शाश्वत हो जाता है और उसकी रसना सत्य में ही मग्न हो जाती है। वह मनुष्य सत्य नाम को सुनकर स्वयं भी मुँह से सत्य का ही बखान करता है॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं