गुरु ग्रंथ साहिब 1198 · Raag Saarang · Guru Nanak Dev Ji
1इस तरीके से जीव रूपी कामिनी को हरि रूपी वर मिलता है और उस प्यारी को सुहाग मिल जाता है।
2गुरु-मत के शब्द का चिंतन करते हुए जाति-वर्ण एवं कुल का संशय दूर हो गया है॥१॥
3जिसका मन परितृप्त हो जाता है, उसे अभिमान नहीं होता और वह हिंसा व लोभ को भुला देता है।
4जीव रूपी कामिनी स्वाभाविक ही पति-प्रभु के साथ आनंद करती है और गुरु के माध्यम से उसका प्रेम रंग संवर जाता है।॥२॥
5ऐसा प्रेम त्याग देना चाहिए, जो परिवार एवं रिश्तेदारों के साथ मोह-माया फैलाता है।
6जिसके अन्तर्मन में ईश्वर से प्रेम नहीं, वह दुविधा एवं विकारयुक्त कर्म करता है॥३॥
7जिसके मन में प्रेम पदार्थ रूपी रत्न विद्यमान होता है, वह दुनिया से छिपा नहीं रहता।
8गुरु नानक का कथन है कि ऐसा गुरमुख युग युग प्रभु का अमूल्य नाम मन में बसाए रखता है॥४॥३॥
9सारंग महला ४ घरु १
10ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
11हम ईश्वर के भक्तजनों की मात्र चरणरज हैं।
12सत्संग में मिलकर परमपद पाया है और ज्ञान हो गया है कि ईश्वर सबमें व्याप्त है॥१॥रहाउ॥।
13यदि सच्चा गुरु संत मिल जाए तो ही शान्ति प्राप्त होती है और वह सभी पाप दुख काट कर दूर कर देता है।
14जब ईश्वर के साक्षात् दर्शन किए तो हमारी अन्तरात्मा प्रफुल्लित हो गई॥१॥
15अहोभाग्य से हमें सत्संग प्राप्त हुई है, जहाँ ज्ञान हो गया केि ईश्वर सर्व व्याप्त है।
16सत्संगियों की चरण-धूल में स्नान करके हमने अड़सठ तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त कर लिया है॥२॥
17दुर्मति एवं विकारों से मलिन हमारी बुद्धि ओछी हो गई है और अशुद्ध हृदय को झूठा मोह लगा हुआ है।
18उत्तम भाग्य के बिना संगत कैसे प्राप्त हो सकती है, अहम्-भावना में लीन मन परेशान रहता है॥३॥
19हे प्रभु ! दयालु हो जाओ, कृपा करो, मैं सत्संगियों की चरण-धूल ही चाहता हूँ।
20नानक का मत है कि जब संत महापुरुष से साक्षात्कार होता है तो ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है और वह प्रत्यक्ष ही परमेश्वर से मिला देता है॥४॥१॥
21सारंग महला ४ ॥
22हम परमात्मा के चरणों पर कुर्बान हैं।
23यह संसार-समुद्र तैरा नहीं जा सकता, यदि परमात्मा का जाप किया जाए तो पार उतारा हो जाता है॥१॥रहाउ॥।
24हृदय में प्रभु के प्रति निष्ठा बनी तो सेवा का विचार किया।
25ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं गुणों का भण्डार है, दिन-रात हृदय में उसके नाम का जाप करो॥१॥
26अपहुँच, मन-वाणी से परे प्रभु सब स्थानों पर रमण कर रहा है और मन तन में भी वही अलख अपार है।
27जब गुरु कृपालु हुआ तो हृदय में अदृष्ट प्रभु के दर्शन हो गए ॥२॥
28समूची पृथ्वी को धारण करने वाला परमेश्वर अन्तर्मन में ही है लेकिन मायावी अहंकारी को वह दूर ही लगता है।
29तृष्णा की अग्नि में जलता हुआ वह कभी नहीं समझता और अपनी जीवन बाजी जुए में हार देता है॥३॥
30जब गुरु की थोड़ी-सी कृपा होती है तो मनुष्य उठते-बैठते सदैव परमात्मा के गुण गाता है।
31हे नानक ! जिन पर ईश्वर की करुणा-दृष्टि हुई है, उसने उनकी लाज़ रख ली है॥ ४ ॥ २ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं