गुरु ग्रंथ साहिब 1197 · Raag Saarang
1रागु सारग चउपदे महला १ घरु १
2वह परमपिता परमेश्वर अद्वितीय है, नाम उसका ‘सत्य' है, वह कर्ता पुरुष सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर से रहित है, वह कालातीत अमर है, वह जन्म-मरण से स्वतंत्र है, वह स्वयं प्रकाशमान हुआ है, गुरु कृपा से प्राप्ति होती है।
3मैं अपने मालिक की दासी हूँ,
4मैंने जगत के जीवनदाता प्रभु के चरण पकड़ लिए हैं और अहम् को मारकर खत्म कर दिया है॥१॥रहाउ॥।
5पूर्ण परम ज्योति परमेश्वर हमें प्राणों से भी प्यारा है,
6उस प्रभु ने मेरा मन मोह लिया है और शब्द के चिंतन से ही उसे समझा जाता है॥१॥
7स्वेच्छाचारी हीन, ओछा एवं झूठी मति वाला होता है और उसके मन तन में पीड़ा ही रहती है।
8जब से रंगीले प्रभु की भक्ति में रत हुआ हूँ, उसका जाप करते हुए मन को शान्ति मिल गई है॥२॥
9जब से अहम् भावना छोड़कर वैराग्यवान हुई हूँ, तब से मेरी अन्तरात्मा ईश्वर में विलीन है।
10कुल रहित, कालिमा से परे परमेश्वर के साथ मन प्रसन्न हो गया है और सारी लोक लाज भूल गई है।॥३॥
11हे मेरे प्रियतम ! तू ही मेरे प्राणों का आधार है, तेरे जैसा भूत भविष्य में कोई नहीं।
12गुरु नानक फुरमाते हैं कि जीव रूपी सुहागिन प्रभु के नाम स्मरण में लीन है और प्रभु ही उसका पति है ॥४॥१॥
13सारंग महला १ ॥
14प्रभु के बिना कैसे रहा जाए, हर तरफ दुख ही दुख है।
15प्रभु भजन के आनंद बिना जीभ का स्वाद भी फीका है और प्रभु के बिना काल भी परेशान करता है।॥१॥रहाउ॥।
16जब तक प्रभु के दर्शन नहीं मिलते तब तक भूखी प्यासी ही रहती हूँ।
17प्रभु के दर्शन पाकर मन आनंदित हो जाता है, जिस प्रकार जल में कमल खिल जाता है॥१॥
18बादल झुककर गरज बरस रहे हैं और मोर एवं कोयल खुशी से झूम रहे हैं।
19ज्यों पेड़-पौधे, पक्षी एवं सांप जल वर्षा से झूमते हैं वैसे ही सुहागिन अपने पति के घर में होने पर आनंद मनाती है॥२॥
20जिसने पति प्रभु के सहज-आनंद को नहीं जाना, वह मैली, कुरुप, कुलक्षणा स्त्री है।
21जिसकी रसना हरि रस के प्रेम में तृप्त नहीं होती, वह खोटी बुद्धि के कारण दुखों में पड़ी रहती है॥३॥
22उसका आवागमन छूट जाता है, न दुखी होती है और उसके शरीर का दुख-दर्द समाप्त हो जाता है
23गुरु नानक फुरमाते हैं कि जिस जीव-स्त्री को प्रभु से सहज सुख प्राप्त होता है, उसके दर्शन से मन को शान्ति मिलती है, ।॥४॥२॥
24सारग महला १ ॥
25मेरा प्यारा प्रभु कहीं दूर नहीं है।
26सतगुरु के वचनों से मेरा मन संतुष्ट हो गया तो प्राणों के आधार प्रभु को प्राप्त कर लिया ॥१॥रहाउ॥।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं