गुरु ग्रंथ साहिब 1196 · Raag Basant · Bhagat Naam Dev Ji
1नामदेव जी कहते हैं कि यदि ईश्वर परम प्रसन्न हो जाए तो ही सेवक की सेवा सफल होती है॥ ३ ॥१॥
2हे ईश्वर ! लोभ की लहरें बहुत उछल रही हैं और
3यह शरीर इसमें ही डूब रहा है ॥१॥
4हे परमेश्वर ! इस संसार-सागर से मुझे पार उतार दो।
5हे पिता परमेश्वर ! मुझे पार उतार दो ॥१॥रहाउ॥।
6मेरी यह जीवन नैया तेज ऑधी में फँस गई है, जिसे मेरा चप्पू आगे ले जाने में नाकामयाब है।
7हे प्रभु ! तेरी कृपा बिना पार नहीं हो सकता ॥२॥
8हे केशव ! मुझ पर दयालु होकर मुझे सतगुरु से मिला दो,
9और भवसागर से पार उतर दो।
10नामदेव जी विनती करते हैं कि मैं तैरना भी नहीं जानता,
11हे प्रभु ! बाँह देकर मुझे बचा लो ॥४॥२॥
12पहले (पाप रूपी) धूल से भरी वस्त्रों (शरीर) की गाड़ी धीरे-धीरे चलती है और
13डंडा लेकर पीछे धोबिन उस गाड़ी को हॉकती है ॥१॥
14जैसे-जैसे धोबिन इस गाड़ी को धोने की तरफ आवाज देकर हॉकती है,
15वह सिर पर गन्दे वस्त्रों को धोने के लिए ले जाती है, इसी प्रकार जीव स्त्री भी अपने कर्मों को धोने के लिए सत्संग में चल पड़ती है॥१॥रहाउ॥।
16गुरु रूपी धोबी सत्संग में आई जीव-स्त्री के मन को प्रेमपूर्वक पावन कर देता है।
17मेरा मन भी ईश्वर के चरणों में ही रत है॥२॥
18नामदेव जी कहते हैं कि ईश्वर सबमें बसा हुआ है और
19अपने भक्तों पर सदा दया करता है॥३॥ ३ ॥
20बसंतु बाणी रविदास जी की
21ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
22तुझे कुछ भी समझ नहीं आ रही,
23केवल सुन्दर पहरावा देखकर गर्व कर रही हो
24परन्तु अभिमानी को कहीं भी ठीर-ठिकाना प्राप्त नहीं होता,
25मौत रूपी कोआ तेरी गर्दन पर मंडरा रहा है॥१॥
26अरे बावली ! तू क्यों अहंकार कर रही है।
27जिस प्रकार भादों के महीने में कुकुरमत्ता उगकर नष्ट हो जाता है, तू उससे भी अधिक उतावली हो रही है॥१॥रहाउ॥।
28जैसे हिरण को कस्तूरी का भेद पता नहीं चलता और
29अपने तन में विद्यमान सुगन्ध बाहर ढूंढता रहता है,
30जो अपने शरीर के महत्व का चिंतन करता है,
31उसे यमदूत तंग नहीं करता ॥२॥
32जीव प्रिय पुत्रों एवं अपनी पत्नी का अहंकार करता है,
33पर यह नहीं सोचता कि मालिक कर्मो का हिसाब मांगने वाला है।
34जीव को अपने किए कर्मों का फल रूपी दुख भोगना पड़ता है,
35मरणोपरांत अपना प्रिय किसे पुकार पाता है॥३॥
36यदि तू साधु की शरण पा ले तो
37तेरे करोड़ों पाप मिट जाएंगे।
38रविदास जी कहते हैं कि जो परमात्मा का नाम जपता है,
39उसकी जाति एवं जन्म-मरण छूट जाता है और योनि से कोई नाता नहीं रह पाता॥४॥१॥
40बसंतु कबीर जीउ
41ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
42[कबीर जी घर में आए कुत्ते को संबोधन करते हुए कहते हैं] तेरी चाल गाय जैसी है और
43पूँछ पर बाल भी चमक रहे हैं।॥१॥
44इस घर में जो कुछ है, तू उसे ढूंढ कर खा ले,
45तू किसी अन्य के घर में मत जाना ॥१॥रहाउ॥।
46चक्की का जो आटा है, उसे चाटकर खा ले,
47पर यह चक्की का चिथड़ा कहां ले जा रहा है॥२॥
48छीके पर तूने बहुत नजर टिकाई हुई है,
49इस बात का ख्याल रखना कहीं लकड़ी का डण्डा तेरी पीठ पर न पड़ जाए॥३॥
50कबीर जी कहते हैं कि तूने अच्छी तरह से खा लिया है,
51चुपके से चले जाओ, कहीं कोई तुझे ईट-पत्थर न मार दे ॥४॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं