सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1193 · Raag Basant · Guru Arjan Dev Ji

1जिस धन दौलत को इकठ्ठा करने में पाप करता है,

2उसे मूर्ख मनुष्य पल में ही छोड़कर चला जाता है।॥५॥

3माया मोह की वजह से जीव भटकता रहता है परन्तु

4कर्म रेख के आधार पर ही वह कर्म करता है।

5विधाता इन सब से आप अलिप्त है

6और पाप-पुण्य का प्रभु पर कोई असर नहीं पड़ता ॥६॥

7हे दयालु परमेश्वर ! मुझे संसार के बन्धनों से बचा लो,

8तू पूर्ण कृपालु है, तेरी शरण में आया हूँ,

9तेरे बिना अन्य कोई ठिकाना नहीं।

10हे प्रभु! कृपा करके नाम प्रदान करो ॥७॥

11हे परमेश्वर ! तू ही संसार का कर्ता है, तू ही सब करने वाला है,

12तू महान् है, तू अपरंपार है।

13नानक विनती करते हैं कि कृपा करके अपने चरणों में लगा लो,

14दास तो प्रभु की शरण में पड़ा हुआ है॥८॥२॥

15बसंत की वार महलु ५

16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

17हे भाई ! परमात्मा के नाम का गहन चिंतन करके तुम आनंदित हो जाओ,

18क्योंकि (प्रभु चिंतन के लिए) यह सुहावनी ऋतु अर्थात् मानव जन्म का अवसर उत्तम भाग्य से प्राप्त होता है।

19नाम रूपी अमृत फल पाकर प्रकृति तीनों लोक खिल उठे हैं।

20साधु-महात्मा को मिलकर सुख उत्पन्न होता है और दुखों की छाया दूर हो जाती है।

21नानक अद्वितीय परमेश्वर का स्मरण करता है, जिससे पुनः योनि चक्र में दौड़ना नहीं पड़ेगा।॥१॥

22जिसने भी सत्यस्वरूप परमेश्वर का सहारा लिया है, उसने कामादिक पाँच महाबली विकारों को बांध लिया है।

23प्रभु सुख दुख में साथ देकर अपने चरणों का ही जाप करवाता है।

24ऐसे जीव के रोग एवं गम सभी मिट जाते हैं और तंदरुस्त रहता है।

25वह दिन-रात प्रभु नाम का ध्यान करता हुआ जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है।

26हे नानक ! ऐसा भक्त जिस प्रभु से उत्पन्न होता है, उसी का रूप हो जाता है।॥२॥

27जीवात्मा कहाँ से पैदा होता है, कहाँ रहता और किस में विलीन हो जाता है।

28सब जीव मालिक के उत्पन्न किए हैं, कोई भी इसकी महत्ता नहीं पा सकता।

29जो ईश्वर की महिमा गाते हैं, उसका ध्यान करते हैं, नित्य भजन सुनते हैं, वही भक्त सुन्दर हैं।

30संसार का मालिक मन-वाणी से परे एवं अपहुँच है, कोई दूसरा उसके गुणों के बराबर तक नहीं पहुँचता।

31नानक तो पूर्ण गुरु का सच्चा उपदेश ही सुना रहा है॥३॥१॥

32बसंतु बाणी भगतां की ॥

33कबीर जी घरु १

34ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

35सम्पूर्ण धरती एवं आकाश ब्रह्म ज्योति से व्यापक है।

36हर मनुष्य में सर्वात्मा ही विद्यमान है॥१॥

37हे भाई ! अनेक प्रकार से परब्रह्म परमेश्वर प्रकाशमान है,

38जहाँ भी मेरी दृष्टि जाती है, वहाँ ईश्वर ही व्याप्त है॥१॥रहाउ॥।

39द्वितीय- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद,

40अठारह स्मृतियों तथा कतेब (कुरान) भी उसकी ज्योति से ही प्रकाशमान हैं।॥२॥

41योग में ध्यानशील भोलेशंकर भी उसकी ज्योति से ज्योतिष्मान हुए हैं।

42कबीर का स्वामी सब में समान रूप से व्याप्त है॥३॥१॥

43पण्डित पुराणों के पाठ-पठन में लीन हैं,

44योगी पुरुष योगाभ्यास के ध्यान में तल्लीन हैं।

45सन्यासी अपने अहंकार में मस्त हैं,

46तपस्वी अपनी तपस्या के भेद में लीन हैं ॥ १॥

47सभी लोग अपनी-अपनी क्रिया में मस्त हैं परन्तु कोई भी जागृत नहीं और

48साथ ही साथ कामादिक चोर जीवों के घर को लूटने में तल्लीन हैं।॥१॥रहाउ॥।

49शुकदेव और भक्त अक्रूर (विकारों से) जागृत रहे।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं