सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1192 · Raag Basant

1बसंतु महला ५ घरु १ दुतुकीआ

2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

3हे मन ! प्रेम से शिक्षाओं को सुनकर जाप कर।

4केवल एक बार नारायण का उच्चारण करने से अजामल का उद्धार हो गया।

5वाल्मीकि को साधुओं की संगत प्राप्त हुई तो वह पार हो गया।

6भक्त धुव को दर्शन देकर ईश्वर प्राप्त हुआ ॥१॥

7हे प्रभु ! तेरे संतजनों की चरणरज चाहता हूँ,

8इसे लेकर माथे पर लगाऊँ, कृपा करके प्रदान करो॥१॥रहाउ॥।

9तोते को हरिनाम का पाठ करवाती हुई गणिका का उद्धार हो गया।

10हाथी ने ध्यान किया तो परमात्मा ने उसे मगरमच्छ से मुक्त करवाया।

11श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण सुदामा की गरीबी को दूर किया।

12हे मन ! तू भी ईश्वर का भजन कर ले ॥२॥

13श्रीकृष्ण के पैर पर तीर से प्रहार करने वाले शिकारी का उद्धार किया।

14अंगूठे के स्पर्श मात्र से ही कुब्जा का उद्धार हो गया।

15सेवा भाव के कारण विदुर का पार उतारा कर दिया।

16हे मन ! तू भी ईश्वर का ध्यान कर ले ॥३॥

17ईश्वर ने स्वयं अपने प्रेिय भक्त प्रहलाद की लाज रखी।

18जब कौरवों की सभा में द्रौपदी के वस्त्रों का हरण किया जा रहा था तो ईश्वर ने ही लाज बचाई।

19जिस-जिसने भी मुसीबत के समय ईश्वर का स्मरण किया, उसे मुक्ति प्राप्त हुई।

20हे मन ! तू भी परमेश्वर का स्मरण कर ले, संसार-सागर से पार उतर जाओगे ॥४॥

21भोलेभाले बालबुद्धि भक्त घन्ना ने ईश्वर की अर्चना की तो प्रभु को पा लिया।

22त्रिलोचन ने गुरु को मिलकर सफलता प्राप्त की।

23बेणी को गुरु ने सत्य का ज्ञान प्रदान किया।

24हे मन ! तू भी ईश्वर का दास बन जा॥५॥

25जयदेव ने अहम्-भावना को त्याग दिया और

26सैन नाई भी ईश्वर की सेवा कर संसार-सागर से पार उतर गया।

27भक्त सैन का मन न ही विचलित हुआ और न ही डगमगाया।

28हे मन ! तू भी ईश्वर शरण की लालसा कर ॥६॥

29हे ठाकुर ! जिस पर तूने कृपा की है,

30उन भक्तों को तूने स्वयं बचा लिया है।

31उनके गुण-अवगुण की ओर तनिक ध्यान नहीं दिया।

32इस तरह देखकर यह मन भी ईश्वर की भक्ति में लग गया है॥७॥

33भक्त कबीर ने प्रेमपूर्वक ईश्वर का ध्यान किया और

34नामदेव के साथ सदैव परमात्मा बसा रहा।

35रविदास ने भी प्रभु का भजन किया।

36नानक का कथन है कि (हरिनाम को रसिया, दुनिया का कल्याण करने वाले) गुरु नानक देव जी देवाधिदेव परमेश्वर का रूप हुए हैं।॥८॥१॥

37बसंतु महला ५ ॥

38हम जीव अनेक जन्म योनियों में घूमते हैं,

39भगवान का स्मरण किए बिना नरक भोगते हैं।

40भगवान की भक्ति से विहीन जीव दुख-तकलीफों में पड़ा रहता है और

41ईश्वर को समझे बिना यम उसे दण्ड प्रदान करता है॥१॥

42हे मेरे मित्र ! सदा ईश्वर का भजन करो और

43सच्चे शब्द से ही सदा प्रेम करो ॥१॥रहाउ॥।

44किसी भी काम से संतोष प्राप्त नहीं होता और

45यह माया का प्रपंच बादल के धुएं की तरह है।

46पाप करते हुए मनुष्य संकोच नहीं करता और

47बुराईयों के जहर में लीन रहकर आवागमन में पड़ा रहता है॥२॥

48मनुष्य जितना अभिमान करता है, उसके विकारों में उतनी ही बढ़ोतरी होती है,

49इस तरह पूरा संसार लोभ मोह में डूब रहा है।

50काम, क्रोध ने मन को वशीभूत किया हुआ है,

51जिस कारण मनुष्य सपने में भी परमात्मा का नाम नहीं लेता ॥३॥

52मनुष्य कभी अमीर बन जाता है तो कभी सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी बन जाता है,

53इस तरह पूर्ण संसार दुख सुख में बंधा हुआ है।

54वह मन के उद्धार का कोई कार्य नहीं करता और

55नित्य पापों के बन्धन में पड़ा रहता है।॥४॥

56अंतकाल घनिष्ठ मित्रों में से कोई साथ नहीं देता और

57मनुष्य अपने किए शुभाशुभ कर्मों का ही फल पाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं