गुरु ग्रंथ साहिब 1190 · Raag Basant · Guru Nanak Dev Ji
1जब गुरु उपदेश का चिंतन कर अहम् दूर होता है तो
2मन में सच्चा योग बस जाता है।॥८॥
3हे मूर्ख ! जिसने तुझे शरीर एवं प्राण दिए हैं, उसका तू चिन्तन नहीं करता।
4श्मशान घाट में भी सच्चा योग नहीं है॥९॥
5नानक यही कल्याणकारी एवं भली बात कहता है कि
6तुम ज्ञानवान होकर सत्य को पहचान लो॥ १०॥५॥
7बसंतु महला १॥
8दुविधा और दुर्मति अज्ञानांध कार्यों में प्रवृत करती है और
9स्वेच्छाचारी उलझनों में भटकता है॥१॥
10अज्ञानांध मन अंधी मति में ही तल्लीन रहता है और
11गुरु द्वारा बताया कार्य किए बिना उसका भ्रम दूर नहीं होता॥१॥रहाउ॥।
12अंधे स्वेच्छाचारी को गुरु-मत अच्छी नहीं लगती।
13इस तरह वह पशु बन जाता है और उसका अभिमान दूर नहीं होता॥२॥
14ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों वाले जीवों को उत्पन्न किया है,
15जब मेरे मालिक की मर्जी होती है तो वह उनकी रचना कर देता है और तदन्तर वे उसी में विलीन हो जाते हैं।॥३॥
16जिनके पास शब्द-गुरु एवं सही जीवन आचरण नहीं, ऐसे सब लोग भूले हुए हैं।
17इस तथ्य को वही समझता है, जिसका गुरु-परमेश्वर मार्गदर्शन करने वाला है॥४॥
18गुरु के सेवक ईश्वर की रज़ा में खुश रहते हैं।
19परमेश्वर कृपा करके उनको बचा लेता है और वे यम के शिकंजे में नहीं पड़ते॥५॥
20जिनके हृदय को ईश्वर भाया है,
21वह स्वयं ही मिलकर भ्रम दूर कर देता है।॥६॥
22स्रष्टा परमेश्वर किसी पर मोहतांज नहीं, वह बे-अंत एवं अपार है,
23वह कर्ता-पुरुष सत्य एवं कीर्तिगान से ही प्रसन्न होता है॥७॥
24गुरु नानक फुरमाते हैं कि भूल करने वाले जीव को गुरु ही समझाकर सही रास्ता बताता है,
25वह एक परम सत्य को दिखाता है और सत्य में स्थिर करता है॥८॥६॥
26बसंतु महला १॥
27ईश्वर स्वयं ही भेंवरा, फूल एवं बेल है और
28वह स्वयं ही सज्जनों की संगत में मिलाने वाला है॥१॥
29ऐसा भैवरा बनकर खुशबू प्राप्त कर कि
30पेड़-पौधे, फल फूल, वन सब हरे भरे महसूस हों।॥१॥रहाउ॥।
31लक्ष्मी एवं लक्ष्मीपति नारायण स्वयं ही है।
32वह शब्द में स्थित होकर स्वयं ही रमण कर रहा है॥२॥
33बछड़ा, गाय और दूध भी वह स्वयं ही है।
34वह स्वयं ही शरीर रूपी मंदिर को स्थापित रखने वाला स्तंभ है॥३॥
35वह स्वयं ही कारण और करने वाला भी वही है और
36वह स्वयं ही गुरुमुख बनकर चिंतन करता है॥४॥
37हे स्रष्टा ! तू सर्वशक्तिमान है और सृष्टि रचना कर तू ही संभाल करता है।
38तू असंख्य जीवों को अपनी ज्योति द्वारा आसरा देता है।॥५॥
39तू गुणों का सरोवर एवं गहरा सागर है।
40तू कुलातीत, कालिमा से परे एवं परम हीरा है॥६॥
41तू ही बनाने वाला है, सबकुछ कर सकने में परिपूर्ण है।
42तू स्वाधीन राजा है और तेरी प्रजा सुखी है॥७॥
43हे नानक ! परमात्मा के नाम स्वाद से ही तृप्ति होती है और
44प्रियतम गुरु परमेश्वर के बिना जिंदगी व्यर्थ है॥८॥७॥
45बसंतु हिंडोलु महला १ घरु २
46ੴ सतिगुर प्रसादि॥
47हे स्रष्टा ! नवखण्ड, सप्तद्वीप, चौदह भवन, तीन लोक एवं चार युगों की रचना कर तुमने सम्पूर्ण सृष्टि को स्थापित कर दिया।
48वेद रूपी चार दीए तथा सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग को एक एक युग का मौका प्रदान कर दिया॥१॥
49हे मेहरबान परमेश्वर ! तुम्हारी शक्ति ऐसी है॥१॥ रहाउ I
50हर जीव में तेरी ज्योति विद्यमान है, यह तेरी सेना है और धर्मराज इनका अधिपति है।
51धरती बहुत बड़ी देग है, जहां से एक बार ही सब कुछ मिल जाता है और किए गए कर्मों के आधार पर फल मिलता है।॥२॥
52मन संतुष्ट नहीं होता, जीव बार-बार कामना करता है और झगड़ा करने वाला दुखी होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं