गुरु ग्रंथ साहिब 118 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1भगवान का भजन करो, जो अंतिमकाल तेरा सहायक बनेगा।
2भगवान अगम्य, अगोचर एवं अयोनि है, जिसका कोई भी स्वामी नहीं। ऐसे प्रभु को सतिगुरु के प्रेम द्वारा ही पाया जाता है ॥१॥
3मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो अपने अहंत्व को दूर कर देते हैं।
4जो व्यक्ति अपने अहंत्व को छोड़ देता है, वह भगवान को पा लेता है और सहज ही भगवान में समा जाता है। १॥ रहाउ॥
5जीव वही कर्म करता है, जो उसकी किस्मत में पूर्व-जन्म के कर्मों द्वारा लिखा होता है।
6सतगुरु की सेवा से वह सदा सुख प्राप्त करता है।
7भाग्य के बिना मनुष्य को गुरु नहीं मिलता। गुरु नाम द्वारा ही जीव को परमेश्वर से मिलाता है॥२॥
8गुरमुख इस संसार में निर्लिप्त होकर रहता है।
9उसको गुरु का आश्रय एवं नाम का सहारा है।
10जो गुरमुख है उसके साथ कौन अन्याय कर सकता है? दुष्ट अपने आप ही मर मिटता है और कष्ट झेलता है॥३॥
11ज्ञानहीन मनमुख को कोई ज्ञान नहीं होता।
12वह आत्मघाती और संसार का जल्लाद है।
13दूसरों की निंदा करके वह पापों का बोझ उठाता है। वह उस मजदूर जैसा है जो बिना मजदूरी लिए दूसरों का भार उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है॥४॥
14यह संसार एक उपवन है और मेरा प्रभु इसका बागबां है।
15वह सदा ही इसकी रक्षा करता है। इसका कोई भाग उसकी देखरेख से अधूरा नहीं हुआ।
16जिस तरह की महक ईश्वर पुष्प में डालता है, वह वैसी ही उसमें प्रबल होती है। सुगंधित पुष्प अपनी सुगंध से जाना जाता है॥५॥
17मनमुख प्राणी इस संसार में रोगग्रस्त रोगी है।
18उसने सुखदाता अगम्य व अनन्त प्रभु को विस्मृत कर दिया है।
19मनमुख हमेशा ही दुखी होकर रोते-चिल्लाते रहते हैं। गुरु के बिना उनको शांति प्राप्त नहीं होती।॥६॥
20जिस प्रभु ने उनकी सृजना की है, वह उनकी दशा को समझता है।
21यदि प्रभु स्वयं दया करे, तब मनुष्य उसके हुक्म की पहचान करता है।
22जिस तरह की बुद्धि ईश्वर प्राणी में डालता है, वैसे ही प्राणी कार्यरत होता है। परमात्मा स्वयं ही प्राणी को बाहर जगत् में जीवन-मार्ग पर लगाता है॥७ ॥
23उस सत्यस्वरूप परमेश्वर के अलावा मैं अन्य किसी को भी नहीं जानता।
24जिसको प्रभु अपनी भक्ति में लगाता है वह पवित्र हो जाता है।
25हे नानक ! परमेश्वर का नाम मनुष्य के हृदय में निवास करता है। लेकिन जिसे प्रभु अपना नाम देता हैं, वही इसको प्राप्त करता है॥८॥१४॥१५॥
26माझ महला ३ ॥
27जो व्यक्ति अमृत-नाम को अपने हृदय में बसा लेता है,
28वह 'मैं' मेरा कहने वाले अहंत्व एवं समस्त दुःखों को नाश कर देता है।
29वह अमृत-वाणी द्वारा सदैव ही भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता है और अमृत-वाणी द्वारा अमृत-नाम को पा लेता है॥१॥
30मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो अमृत वाणी को अपने हृदय में बसा लेते हैं।
31वह अमृत वाणी को अपने हृदय में बसाकर अमृत नाम का ध्यान करता रहता है।॥१॥ रहाउ ॥
32वह अपने मुँह से वचनों द्वारा हमेशा ही अमृत-नाम बोलता रहता है और अपनी आँखों से अमृत रूप परमात्मा को सर्वव्यापक देखता है एवं सत्य की परख करता रहता है।
33वह सदैव ही दिन-रात हरि की अमृत कथा करता है तथा दूसरों को भी यह कथा बोलकर सुनाता है॥२॥
34अमृत-नाम के प्रेम में मग्न हुआ व्यक्ति भगवान में सुरति लगाता है
35और यह अमृत-नाम उसे गुरु की कृपा से ही मिलता है।
36वह दिन-रात नाम-अमृत को अपनी रसना से बोलता रहता है और भगवान उसे मन एवं तन द्वारा नाम-अमृत ही पान करवाता है॥३॥
37भगवान वही कुछ करता है, जो मनुष्य की कल्पना में भी नहीं होता।
38उसके हुक्म को कोई भी मिटा नहीं सकता।
39भगवान के हुक्म से ही गुरु के माध्यम से जीवों को अमृत वाणी का पान करवाया जाता है। भगवान अपने हुक्म से ही मनुष्य को नाम-अमृत का पान करवाता है॥४॥
40हे सृजनहार परमेश्वर ! तेरे कौतुक बड़े अदभुत हैं।
41जब यह मन भटक जाता है तो तू ही उसे सदमार्ग लगाता है।
42जब मनुष्य अमृत-वाणी में अपना चित्त लगाता है तो तू उसके अन्तर्मन में अमृत अनहद शब्द बजा देता है॥५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं