सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1188 · Raag Basant · Guru Nanak Dev Ji

1भूला हुआ मन भंवरे की तरह भटकता है और

2व्यर्थ ही बहुत सारे विकारों की चाह करता है।

3इसका हाल तो इस तरह है ज्यों हाथी कामवासना में फंसा रहता है,

4जंजीर के साथ बंधकर सिर पर चोटें सहता है॥२॥

5परमात्मा की भक्ति से विहीन मूर्ख मन मेंढक समान है।

6प्रभु के द्वार से निकाला हुआ, शापित एवं नाम से विहीन है।

7ऐसे व्यक्ति की न कोई जाति है, न वंश है और उसका कोई नाम तक नहीं लेता।

8गुणों से विहीन होने के कारण सभी दुख उसके साथी बन जाते हैं।॥३॥

9मन बहुत चंचल है, बिल्कुल नहीं टिकता, इसे काबू में रखना चाहिए।

10ईश्वर की भक्ति रस में रत हुए बिना इसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं और न ही कोई भरोसा करता है।

11हे परमेश्वर ! तू स्वयं ध्यान रखने वाला और स्वयं ही बचाने वाला है।

12दुनिया को बनाकर स्वयं ही देखता एवं जानता है।॥४॥

13ईश्वर स्वयं ही भुला देता है तो फिर किसके पास जाकर फरियाद की जाए।

14हे माँ! गुरु से भेंटवार्ता कर उसे मन की व्यथा बताई जा सकती है।

15अवगुणों को छोड़कर गुणों की कमाई करो।

16गुरु के उपदेश में रत रहकर सत्य में लीन होना चाहिए॥५॥

17अगर सच्चा गुरु मिल जाए तो बुद्धि उत्तम हो जाती है।

18अहम् की मैल को धो कर मन निर्मल हो जाता है।

19जीव संदा के लिए मुक्त हो जाता है और कोई बन्धन उसे बांध नहीं सकता।

20वह सदा प्रभु के नाम की चर्चा करता है और किसी अन्य की बात नहीं करता॥ ६॥

21मन ईश्वर की रज़ा से ही आता जाता है,

22सब में एक ईश्वर ही मौजूद है और उसकी रज़ा पर एतराज नहीं किया जा सकता।

23सब में उसका हुक्म चल रहा है और पूरा संसार उसके हुक्म में विलीन है।

24संसार के समस्त दुखसुख उसकी रज़ा से प्राप्त होते हैं।॥७॥

25हे ईश्वर ! तू भूलों से रहित है और कभी भूल नहीं करता।

26जिसे गुरु उपदेश सुनाता है, उसकी बुद्धि उज्ज्वल हो जाती है।

27हे निरंकार ! तू बड़ा मालिक है और शब्द में विद्यमान है।

28गुरु नानक फुरमाते हैं कि सच्चे परमेश्वर की स्तुति से मन आनंदित हो गया।है॥ ८॥ २॥

29बसंतु महला १॥

30जिस पुरुष को प्रभु दर्शन की तीव्र लालसा होती है,

31वह दुविधा को त्यागकर केवल प्रभु में ही लीन रहता है।

32वह नाम अमृत का मंथन करके सेवन करता है, जिससे उसका दुख दर्द दूर हो जाता है।

33गुरु से तथ्य को बूझकर वह एक प्रभु में समाया रहता है।॥१॥

34हे परमेश्वर ! तेरे दर्शन के लिए कितने ही लोग तरसते रहते हैं परन्तु

35कोई विरला ही गुरु के उपदेश में लीन रहकर पहचानता है।॥१॥रहाउ॥।

36वेद व्याख्या करके कहते हैं कि एक ईश्वर की भक्ति करो,

37वह बेअंत है और उसका रहस्य कौन पा सकता है।

38एक वही रचयिता है, जिसने पूरे जगत को बनाया है।

39उसने बिना किसी सहारे के धरती एवं गगन को स्थापित किया हुआ है।॥२॥

40ईश्वरीय वाणी की धुन एकमात्र ज्ञान एवं ध्यान है,

41एकमात्र वही संसार से निर्लिप्त है, जिसकी कथा अकथनीय है।

42एक शब्द ही ईश्वर का सच्चा निशान है और

43पूरे गुरु से मनुष्य इस बात को जान पाता है॥३॥

44जो कोई प्रभु-भक्ति को सच्चा धर्म मानकर बसा लेता है,

45वह गुरु के उपदेशानुसार युग-युग सफल होता है।

46वह अनाहत नाद में लीन होकर ईश्वर में लगन लगाए रखता है।

47वह गुरु के माध्यम से अलख परमात्मा को पा लेता है॥४॥

48एक परमेश्वर ही पूरे विश्व का बादशाह है और एक उसका ही सिंहासन स्थापित है।

49वह बेपरवाह है, सब में व्याप्त है।

50तीनों लोकों का सार भी उसका बनाया हुआ है,

51वह एक ऑकार अपहुँच एवं मन-वाणी से परे है॥५॥

52यह सम्पूर्ण सृष्टि उसका स्वरूप है, उसका नाम शाश्वत है,

53वह अपने दरबार में हर जीव के साथ सच्चा न्याय करता है।

54जो सत्कर्म करता है, उसे ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

55ऐसा जीव प्रभु के सच्चे दरबार में सम्मान पाता है॥६॥

56एक ईश्वर की भक्ति और एक उसका प्रेम ही मोक्ष का साधन है।

57प्रभु की भक्तिभाव के बिना आवागमन बना रहता है।

58गुरु से अच्छी तरह समझ कर मेहमान की तरह रहना चाहिए और

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं