सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1185 · Raag Basant · Guru Arjan Dev Ji

1बाँह से पकड़कर मुझे संसार-सागर से पार उतार दिया है॥२॥

2प्रभु ने मेरी बुराई की मैल को काटकर निर्मल कर दिया है,

3अब पूर्ण गुरु की शरण में पड़ा रहता हूँ॥३॥

4यह ईश्वर की लीला है कि वह सर्वकर्ता स्वयं ही करता है।

5हे नानक ! वह कृपा करके उद्धार कर देता है॥४॥४॥ १७॥

6बसंतु महला ५

7ੴ सतिगुर प्रसादि॥

8देख खुशियों के फूल ही फूल खिले हुए हैं,

9हे मनुष्य ! अहम् को पूर्णतया त्याग दे

10चरण कमल में लीन होने से

11तुम्हें प्रभु मिल सकता है,

12इसलिए हे मेरे मन ! ईश्वर का चिंतन कर लो॥रहाउ॥।

13कुछ पेड़ छायादार, खुशबूदार एवं कोमल होते हैं परन्तु

14कुछ पेड़ शुष्क एवं कठोर लकड़ी वाले होते हैं।

15बसंत ऋतु के आगमन पर

16पूरी वनस्पति प्रफुल्लित हो जाती है॥१॥

17हे जीव ! अब कलियुग आ गया है,

18शरीर रूपी खेत में प्रभु नाम बो लो,

19अन्य मौसम (जन्म) मे शायद बोया नहीं जा सकेगा।

20अतः प्रभु का नाम वो लो। हे मन ! किसी भ्रम में मत भूलो क्योंकि

21गुरु के मिलने पर ही परमात्मा प्राप्त होता है, जिसके मस्तक पर भाग्य होता है।

22हे मन ! यह मौसम (अर्थात् मनुष्य जन्म) प्रभु नाम के सिमरन का है,

23अतः नानक भी ईश्वर का यशोगान कर रहा है।॥२॥ १८॥

24बसंतु महला ५ घरु २ हिंडोल

25ੴ सतिगुर प्रसादि॥

26हे मेरे भाई ! आप सब एकत्रित होकर सत्संग में मिल जाओ और ईश्वर में ध्यान लगाकर दुविधा को दूर करो।

27हरिनाम का भजन करने वालों के साथ जोड़ी बनाओ और गुरु के सन्मुख चौपड़ की बिसात बिछाकर बैठ जाओ॥१॥

28हे भाई ! इस तरीके से बाजी खेलकर शुभ कर्मों का पासा फॅको।

29गुरु के सन्मुख दिन-रात परमात्मा के नाम का जाप करो, इससे अन्तिम समय तुम्हें कोई दुख-तकलीफ नहीं लगेगी।॥१॥रहाउ॥।

30तुम शुभ कर्म एवं धर्म की चौपड़ बनाओ और सच्चाई की गोटियाँ तैयार कर लो।

31काम, क्रोध, लोभ एवं मोह पर विजय पा लो, यही खेल ईश्वर को प्रिय है॥ २॥

32प्रभात काल उठकर स्नान करो और ईश्वर की आराधना में लीन हो जाओ।

33इस तरह मेरा सच्चा गुरु जीवन के विकट दांव से पार उतार देता है और जीव सुखपूर्वक अपने सच्चे घर पहुँच जाता है।॥३॥

34ईश्वर स्वयं ही खेल खेलता है, देखता भी स्वयं ही है और उसने ही यह जगत रचना रची हुई है।

35हे नानक ! जो व्यक्ति गुरु के सान्निध्य में जिन्दगी रूपी खेल खेलता है, वहीं जीवन बाजी जीतकर अपने घर आता है॥४॥१॥ १६॥

36बसंतु महला ५ हिंडोल॥

37हे स्रष्टा ! अपनी कुदरत को तू ही जानता है, कोई दूसरा नहीं जानता।

38हे मेरे प्यारे ! जिस पर तू कृपा करता है, वही तुझे पहचान पाता है॥१॥

39मैं तेरे भक्तों पर कुर्बान जाता हूँ।

40हे प्रभु !तेरा स्थान बहुत सुहावना है और तेरी लीलाएँ विचित्र हैं।॥१॥रहाउ॥।

41तेरी सेवा भक्ति तेरे प्रोत्साहन से ही होती है, अन्य कोई भी तेरी मर्जी के बिना नहीं कर सकता।

42जो तुझे अच्छा लगता है, वही तेरा भक्त है, जिसे तू भक्ति के रंग में रंग देता है।॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं