गुरु ग्रंथ साहिब 117 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1वह नाम द्वारा अपने अहंकार को नष्ट करके विनम्रता धारण करता है। वह अपने मन को वश में करके मोक्ष द्वार को पा लेता है ॥३ ॥
2वह अपने पापों को नाश कर देता है और क्रोध को दूर कर देता है।
3वह गुरु की वाणी को अपने हृदय में बसाकर रखता है।
4वह सत्य नाम के प्रेम में मग्न रहता है और उसके मन में प्रभु-मिलन का वैराग्य बना रहता है। वह अपने अहंकार को नष्ट करके प्रभु को मिल पाता है॥४॥
5मनुष्य के हृदय में नाम रूपी अमूल्य रत्न है। यह रत्न उसे गुरु के मिलाने से ही प्राप्त होता है।
6माया (रज, तम, सत) त्रिगुणात्मक है अतः मन की इच्छाएँ भी तीन प्रकार की होती हैं।
7पण्डित एवं मोनधारी ऋषि धार्मिक ग्रंथों को पढ़-पढ़कर थक चुके हैं परन्तु उन्हें चतुर्थ पद तुरीया अवस्था का ज्ञान नहीं हुआ ॥५॥
8ईश्वर स्वयं ही जीवों को अपना प्रेम रंग चढ़ाकर रंग देता है।
9लेकिन वही पुरुष प्रभु के प्रेम में रंग जाते हैं जो गुरु की वाणी के प्रेम में रंग जाते हैं।
10उन्हें अपार परमात्मा के प्रेम का रंग इतना चढ़ जाता है कि वह स्वाद ले लेकर भगवान की महिमा-स्तुति करते रहते हैं।॥ ६॥
11गुरमुख के लिए वह सद्पुरुष ही ऋद्धि, सिद्धि और संयम है।
12गुरमुख को ज्ञान प्राप्त हो जाता है और हरिनाम द्वारा वह माया से मुक्त हो जाता है।
13पवित्रात्मा गुरमुख सत्य कर्म करता है और सत्य प्रभु के सत्य नाम में लीन हो जाता है।॥७॥
14भगवान स्वयं ही मनुष्य को गुरमुख बनाता है और गुरमुख यही अनुभव करता है कि ईश्वर ही सृष्टि की रचना करके स्वयं ही प्रलय करता है।
15गुरमुख का ईश्वर स्वयं ही जाति और समूह सम्मान है।
16हे नानक ! गुरमुख सत्यनाम की आराधना करता है और परमेश्वर के नाम में ही लीन हो जाता है॥८॥१२॥१३॥
17माझ महला ३ ॥
18सृष्टि की रचना एवं प्रलय शब्द द्वारा ही होती है
19और शब्द द्वारा ही प्रलय के उपरांत ही पुनः सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
20वह सत्य-परमेश्वर स्वयं ही गुरु के रूप में सर्वव्यापक है। गुरु-परमेश्वर स्वयं ही सृष्टि-रचना करके इसमें समाया हुआ है॥१॥
21मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जिन्होंने पूर्ण गुरु को अपने हृदय में बसाया है।
22गुरु से ही मनुष्य को शांति प्राप्त होती है और वह दिन-रात भगवान की भक्ति करता रहता है। वह प्रभु के गुण अपने मुख से उच्चरित करता रहता है और गुणों के स्वामी परमात्मा में ही समा जाता है॥१॥ रहाउ॥
23गुरु ने ही धरती, जल,
24पवन एवं अग्नि को पैदा किया है और गुरु स्वयं ही एक अदभुत खेल को खेल रहा है।
25निगुरा वह व्यक्ति होता है, जो जन्मता-मरता रहता है। निगुरा जन्म-मरण के चक्र में ही पड़ा रहता है।॥२॥
26उस सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने यह जगत् अपनी एक खेल रचा हुआ है।
27उसने मानव शरीर में सब कुछ डाल दिया है
28जो व्यक्ति शब्द द्वारा भगवान के आत्मस्वरूप का भेद समझ लेता है, भगवान उस व्यक्ति को अपने आत्मस्वरूप में आमंत्रित कर लेता है॥३॥
29वह परमात्मा ही सच्चा साहूकार है और जीव सच्चे व्यापारी हैं।
30जीव अनंत प्रभु के रूप गुरु से प्रेम करके सत्य नाम का व्यापार करते हैं।
31वे सत्य नाम खरीदते हैं और सत्य नाम की कमाई करते रहते हैं। वह सत्य द्वारा सत्य नाम ही कमाते हैं।॥४॥
32सत्य नाम की पूँजी के बिना सत्य नाम रूपी वस्तु को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है?
33मनमुख व्यक्ति भटके हुए हैं
34और नाम रूपी पूँजी के बिना वह दुनिया से खाली हाथ चले जाते हैं और खाली हाथ बड़े दुःखी होते हैं॥५ ॥
35जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा सत्य नाम का व्यापार करते हैं,
36वह भवसागर से पार हो जाते हैं और अपनी वंशावलि के समस्त सदस्यों को भी पार करवा देते हैं।
37ऐसे लोगों का ही जन्म लेकर दुनिया में आगमन सफल होता है और वे अपने प्रिय प्रभु से मिलकर सुखी रहते हैं।॥६॥
38प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में नाम रूपी वस्तु विद्यमान है परन्तु मूर्ख मनमुख इसे अपने शरीर से बाहर ढूंढता रहता है।
39ज्ञानहीन मनमुख प्रेतों की तरह पागल हुए फिरते रहते हैं।
40जहाँ नाम रूपी वस्तु मिलती है, वहाँ कोई भी उसे प्राप्त नहीं करता। मनमुख व्यक्ति भ्रम में फसकर भटकते रहते हैं।॥७॥
41परमात्मा स्वयं ही जीव को आमंत्रित करके शब्द द्वारा नाम रूपी वस्तु देता है।
42जीव परमात्मा के स्वरूप में पहुँच कर परमानंद एवं सुख भोगता है।
43हे नानक ! नाम में लीन रहने वाले को भगवान के दरबार में बड़ी शोभा मिलती है और वह स्वयं ही सुन-सुनकर ध्यान लगाता है॥८॥१३॥१४॥
44माझ महला ३ ॥
45सतगुरु ने यही सच्ची शिक्षा सुनाई है कि
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं