गुरु ग्रंथ साहिब 1175 · Raag Basant · Guru Amar Daas Ji
1उस सच्चे प्रभु के दरबार में ही शोभा प्राप्त होती है और
2उसे ही अपने सच्चे घर में निवास प्राप्त होता है॥३॥
3परमात्मा कोई भूल नहीं करता, वही शाश्वत है,
4शेष संसार के सब लोग भूल कर रहे हैं और द्वैतभाव में अपनी प्रतिष्ठा खो देते हैं।
5शुद्ध वाणी से ईश्वर का भजन करो,
6हे नानक ! यह वाणी सत्य की स्तुति में ही लीन रहती है॥४॥९॥
7बसंतु महला ३॥
8परमात्मा की कृपा के बिना सब लोग भ्रमों में भूले हुए हैं और
9माया मोह में बहुत दुख पाते हैं।
10अन्धे स्वेच्छाचारी को कहीं ठौर-ठिकाना प्राप्त नहीं होता,
11इस तरह विष्ठा का कीड़ा विष्ठा में ही मिला रहता है।॥१॥
12जो हुक्म को मानता है, उसी का जीवन सफल होता है।
13गुरु के शब्द द्वारा उसे नाम का निशान प्राप्त हो जाता है।॥१॥रहाउ॥
14जिनके भाग्य में लिखा होता है, वे ईश्वर में ही लीन रहते हैं और
15प्रभु का नाम सदा उनके मन को अच्छा लगता है।
16सतगुरु की वाणी से सदा सुख प्राप्त होता है और
17वही आत्म-ज्योति को परम-ज्योति से मिलाती है॥२॥
18केवल परमात्मा का नाम ही संसार को मुक्ति प्रदान करने वाला है,
19गुरु की कृपा से नाम से प्रेम होता है।
20प्रभु-नाम बिना किसी ने मुक्ति प्राप्त नहीं की और
21पूरे गुरु से ही नाम प्राप्त होता है॥३॥
22वही समझता है, जिसे परब्रह्म स्वयं समझाता है।
23सतगुरु की सेवा से प्रभु का नाम दृढ़ करवाता है।
24जिसने ईश्वर को जान लिया है, वही व्यक्ति परवान हुआ है,
25हे नानक ! प्रभु नाम में निमग्न जीव उसके द्वार को पाते हैं।॥४॥ १०॥
26बसंतु महला ३॥
27जिस परं ईश्वर कृपा करता है, उसे सतगुरु से मिला देता है और
28स्वतः ही मन में आ बसता है।
29तदुपरांत जीव की मति निश्चल हो जाती है और उसका मन सदैव शांत रहता है।
30फिर वह गुणी गम्भीर प्रभु के गुण गाता रहता है॥१॥
31ईश्वर के नाम को भुलाने वाले पापों का जहर खा कर मर जाते हैं और
32अपना जन्म व्यर्थ गंवाकर पुनः आते जाते हैं।॥१॥रहाउ॥
33बहुत वेष धारण करने से मन को शान्ति प्राप्त नहीं होती और
34बहुत अभिमान करने वाला अपनी प्रतिष्ठा खो देता है।
35वही भाग्यशाली है, जिसने शब्द के रहस्य को पहचान लिया है और
36उसका बाहर जा रहा मन सच्चे घर में आ जाता है।॥२॥
37हृदय घर में ही अगम्य अपार नाम रूपी वस्तु विद्यमान है और
38गुरु उपदेशानुसार शब्द के चिंतन से इसे खोजा जा सकता है।
39जिसे हृदय घर में नाम रूप नवनिधि प्राप्त हो जाती है,
40वह सदा नाम रंग में लीन रहकर सत्य में समा जाता है।॥३॥
41मनुष्य से तो कुछ नहीं हो सकता, ईश्वर ही सब करता है।
42वह स्वेच्छा से स्वयं ही मिला लेता है।
43हे नानक ! कोई भी जीव उससे निकट व दूर नहीं है,
44क्योंकि परमात्मा सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है॥ ४॥ ११॥
45बसंतु महला ३॥
46जो गुरु के उपदेश द्वारा स्वाभाविक ही निरंकार का चिंतन करता है,
47राम नाम के भजन में ही तृप्त रहता है।
48उसके करोड़ों ही पाप जल जाते हैं और
49सांसारिक कार्य करता हुआ मोह-माया से निर्लिप्त रहकर वह प्रभु के नाम में ही समा जाता है।॥१॥
50अपनी बख्शिशों को ईश्वर स्वयं ही जानता है।
51गुरु के उपदेश द्वारा यह मन खिलकर गुणों के दाता प्रभु के नाम की ही चर्चा करता है॥१॥रहाउ॥
52भगवा वेश धारण कर भ्रमण करने से भी मुक्ति नहीं होती और
53बहुत संयम करने से भी किसी को शान्ति प्राप्त नहीं होती।
54गुरु की शिक्षा से ही नाम प्राप्त होता है और
55भाग्यशाली ही भगवान को पाता है॥२॥
56कलियुग में राम नाम की ही कीर्ति है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं