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गुरु ग्रंथ साहिब 1173 · Raag Basant · Guru Amar Daas Ji

1यदि परमात्मा कृपादृष्टि कर दे तो अभिमान दूर हो जाता है और

2सच्चे दरबार में यश प्राप्त होता है।

3भक्तजन ईश्वर को सदैव पास ही देखते हैं और

4गुरु के शब्द से उनको सब में व्याप्त ईश्वर दिखाई देता है॥ ३॥

5परमात्मा संसार के समस्त जीवों का पोषण करता है,

6गुरु की कृपा से सदा उसका स्मरण करो।

7इस तरह सम्मानपूर्वक सच्चे घर में जाओ।

8नानक फुरमाते हैं कि प्रभु नाम से ही बड़ाई प्राप्त होती है॥४॥३॥

9बसंतु महला ३॥

10(परमात्मा की) सच्ची पूजा मन से ही होती है और

11सर्वत्र एक ईश्वर के अलावा अन्य कोई दिखाई नहीं देता।

12संसार के लोगों ने द्वैतभाव में फँसकर बहुत दुख पाया है,

13लेकिन सतगुर ने मुझे परमशक्ति के दर्शन करवा दिए हैं।॥१॥

14मेरा प्रभु बसंत की तरह पूरे विश्व में सदैव खिला रहता है और

15यह मन गोविन्द के गुण गाकर खिल गया है॥१॥ रहाउ॥

16गुरु से पूछकर तुम चिंतन करोगे

17तो ही सच्चे प्रभु से प्रेम लगेगा।

18यदि अहम् छोड़कर विनम्र भावना धारण करोगे

19तो ईश्वर मन में बस जाएगा॥२॥

20जो भक्ति करता है, वह सदैव प्रभु को सन्मुख देखता है।

21मेरा प्रभु सदा सर्वव्यापक है।

22इस भक्ति का जो कोई रहस्य जान लेता है,

23उसे ज्ञान हो जाता है कि सबमें प्रभु ही रमण कर रहा है॥३॥

24सतगुरु स्वयं ही संयोग बनाकर मिलाता है और

25ईश्वर की भक्ति में चित्त लगा देता है।

26हे नानक ! उसका मन तन सहज स्वभाव खिला रहता है और

27प्रभु नाम में ही लगन लगी रहती है।॥४॥ ४॥

28बसंतु महला ३॥

29भक्तवत्सल हरि मन में विद्यमान

30गुरु की कृपा से सहज स्वभाव ही हो जाता है।

31यदि मन से अहम् को छोड़कर भक्ति की जाए

32तो ही भगवान से साक्षात्कार होता है।॥१॥

33भक्त सदैव प्रभु के द्वार पर शोभा देते हैं और

34गुरु के अनुराग से प्रभु से प्रेम बना रहता है।॥१॥ रहाउ॥

35जो व्यक्ति भक्ति करता है, वही निर्मल होता है।

36जब गुरु के उपदेश से वह मन से अहम्-भावना को निकाल देता है।

37तब ईश्वर स्वयं ही मन में आ बसता है और

38स्वाभाविक ही मन में सदा सुख-शान्ति बनी रहती है॥२॥

39जो ईश्वर की अर्चना में रत रहते हैं, वे सदा वसंत की तरह खिले रहते हैं,

40प्रभु की महिमागान कर उनका मन तन आनंदित बना रहता है।

41हरिनामोपासना बिना पूरा संसार सूखा है और

42बार-बार तृष्णाग्नि में जलता है॥३॥

43(संसार का भी क्या दोष) जैसी परमात्मा की मर्जी होती है, वह वही करता है।

44यदि उसकी रज़ानुसार नाम में चित लगाए तो शरीर सदा सुख पाता है।

45वह सहज-स्वभाव अपने प्रभु की उपासना करता है और

46नानक फुरमाते हैं कि नाम उसके मन में बस जाता है॥४॥५॥

47बसंतु महला ३॥

48शब्द-गुरु से माया मोह को जलाया जा सकता है और

49सतगुरु के प्रेम व रज़ा से मन-तन खिल जाता है।

50तन रूपी वृक्ष वही सफल है, जो प्रभु के द्वार पर स्थित होता है।

51वह सच्ची वाणी प्रभु-नाम से ही प्रेम करता है॥१॥

52यह मन रूपी वृक्ष सहज स्वभाव हरा-भरा हो गया है और

53गुरु के प्रेम से इसे नाम रूपी सत्य का फल लगा है॥१॥ रहाउ॥

54ईश्वर स्वयं ही हमारे निकट है और स्वयं ही दूर है,

55पर गुरु के उपदेश से वह सदा सम्मुख ही दिखाई देता है।

56हरित वनस्पति की छांव बहुत घनी होती है और

57गुरुमुख सहज स्वभाव खिला रहता है।॥२॥

58वह दिन-रात परमात्मा का कीर्तिगान करता है और

59सतगुरु उसके मन से झूठ की भ्रांति निकाल देता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं