गुरु ग्रंथ साहिब 1170 · Raag Basant · Guru Nanak Dev Ji
1(उत्तर) यदि गुरु का साथ प्राप्त हो जाए तो वह प्रभु के दर्शन करवा देता है॥१॥
2हे सखी सहेलियो ! मिलकर ईश्वर का यशगान करना ही अच्छा है।
3जीव रूपी कामिनी प्रभु के संग मिलकर रमण करती है और गुरु द्वारा खोजकर उसका मन आनंदित हो जाता है।॥१॥ रहाउ॥
4मनमुखी बदनसीब जीव स्त्रियों को यह रहस्य मालूम नहीं कि
5वह सबका प्यारा प्रभु घट-घट में रमण कर रहा है।
6गुरु उपदेशानुसार अनुसरण करने वाली जीव-स्त्रियां इस भेद को जान लेती हैं कि प्रभु हमारे साथ ही मन में स्थिर है।
7गुरु ने उनके अन्तर्मन में प्रभु-नाम ही दृढ़ करवाया है, अतः वे प्रभु का नाम जपती रहती हैं॥२॥
8गुरु के बिना परमात्मा की भक्ति व चिन्तन नहीं
9गुरु के बिना संतों की संगत भी संभव नहीं,
10गुरु शरण बिना अंधे जीव संसार के कार्यों में लग रोते है
11गुरु की शरण में आने से मन निर्मल हो जाता है और गुरु का उपदेश विकारों की मेल धो देता है॥३॥
12गुरु संयोग बनाकर मन को मार देता है,
13तदन्तर मन दिन-रात प्रभु-भक्ति में लीन रहता है।
14गुरु-संत के संपर्क में रहने से तमाम दुख-रोग मिट जाते हैं।
15गुरु नानक का मत है कि प्रभु से मिलकर सहजावस्था प्राप्त हो जाती है।॥४॥ ६॥
16बसंतु महला १॥
17परमात्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि की रचना करता है,
18वह स्वयं ही अपने हुक्म से किए गए कर्मो के आधार पर जीवों का निर्णय करता है।
19गुरु के उपदेश से उत्तम प्रभु साथ ही अनुभव होता है और
20सहज स्वभाव ही हरि नाम रूपी धन प्राप्त हो जाता है॥ १॥
21हे मन ! राम नाम का भजन कर, भूल मत जाना।
22वह अपरंपार, मन-वाणी से परे है और वह स्वयं ही गुरु से अपनी महिमा का गुणगान करवाता है।॥१॥ रहाउ॥
23गुरु के शिष्य गुरु चरणों की पूजा-वन्दना करते हैं,
24वे गुरु की सेवा द्वारा अहम् भावना को त्यागकर संसार-सागर से मुक्त हो जाते हैं।
25निंदा करने वाले पुरुष सदा लोभ करते हैं और उनका मन भी बड़ा कठोर होता है।
26उनको गुरु की सेवा बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, दरअसल वे सबसे बड़े चोर हैं।॥२॥
27यदि गुरु प्रसन्न हो जाए तो वह प्रेम-भक्ति की बख्शिश कर देता है,
28गुरु के खुश होने से ही ईश्वर का घर प्राप्त होता है।
29वह निंदा छोड़कर भगवान की भक्ति में जाग्रत रहता है,
30उत्तम भाग्य से भगवान की भक्ति सुन्दर लगती है॥३॥
31जिसका गुरु से मिलाप हो जाता है, वह उसे नाम-स्मरण का दान प्रदान करता है।
32गुरु के प्यारे शिष्य दिन-रात हरिनामोच्चारण में लीन रहते हैं।
33गुरु जिस पर प्रसन्नता के घर में आता है, उसे फल रूप में नाम ही प्राप्त होता है, और
34गुरु नानक का मत है कि कोई विरले ही नाम पाते हैं॥ ४॥ ७॥
35बसंतु महला ३ इक तुका॥
36मालिक की मर्जी से ही सेवक सेवा करता है,
37वह संसार में मोह-माया से निर्लिप्त रहकर सभी कुलों का उद्धार कर देता है।॥१॥
38हे मालिक ! बेशक कोई मुझ पर हँसता रहे, तेरी भक्ति नहीं छोड़ सकता,
39मेरे हृदय में तेरा शाश्वत नाम बस गया है॥ १॥ रहाउ॥
40जैसे प्राणी माया-मोह में लीन रहते हैं,
41वैसे ही भक्तजन प्रभु-भजन में ही मग्न रहते हैं।॥२॥
42हे दयासागर ! मुझ मूर्ख नासमझ पर दया करो,
43मैं सदा तेरी शरण में पड़ा रहूँ॥३॥
44नानक कहते हैं कि संसार के काम धंधे निरर्थक हैं और
45गुरु की कृपा से ही कोई हरि-नामामृत प्राप्त करता है।॥४॥ ८॥
46महला १ बसंतु हिंडोल घरु २
47ੴ सतिगुर प्रसादि॥
48हे ब्राह्मण ! तुम शालग्राम की पूजा-अर्चना करते हो, उसे मनाते हो, शुभ आचरण के तौर पर तुलसी की माला फेरते हो।
49राम नाम का जाप करो, इसे भवसागर पार करने के लिए बेड़े के रूप में तैयार करो और यही सच्ची वन्दना करो कि हे दया सागर ! हम पर दया करो॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं