गुरु ग्रंथ साहिब 116 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1मनमुख व्यक्ति माया-धन संचित करते हैं जो खोटी पूंजी है और वह इस खोटी पूंजी का ही प्रसार करते हैं।
2वह माया धन की मिथ्या कमाई करते हैं और अत्यंत कष्ट सहन करते हैं।
3वे भृम में फँसकर दिन-रात भटकते रहते हैं और जीवन-मृत्यु के बंधन में पड़कर अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं।॥७॥
4सत्यस्वरूप परमात्मा मुझे अत्यन्त प्रिय है।
5पूर्ण गुरु का शब्द मेरा जीवन आधार है।
6हे नानक ! जिनको परमात्मा के नाम की शोभा प्राप्त होती है, वह दुख-सुख को एक समान जानते हैं॥८॥१०॥११॥
7माझ महला ३ ॥
8हे ठाकुर जी ! चारों ही उत्पत्ति के स्रोत तेरे हैं और चारों ही वाणी तेरी है।
9प्रभु के नाम के बिना सारी दुनिया भ्रम में भटकी हुई है।
10गुरु की सेवा करने से ईश्वर का नाम प्राप्त होता है। सतिगुरु के बिना किसी को भी ईश्वर का नाम नहीं मिल सकता ॥१॥
11मैं उन पर कुर्बान हूँ, जो ईश्वर के साथ अपना चित्त लगाते हैं।
12सत्यस्वरूप ईश्वर गुरु-भक्ति से ही प्राप्त होता है और प्रभु सहज ही मनुष्य के हृदय में निवास करता है॥१॥ रहाउ॥
13यदि मनुष्य सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करे, तो वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है।
14जिस तरह की कामना हेतु वह सेवा में सक्रिय होता है, वैसा ही फल वह प्राप्त करता है।
15सतिगुरु समस्त पदार्थों का दाता है। भगवान भाग्यशाली व्यक्ति को ही गुरु से मिलाता है॥२॥
16यह मलिन मन एक ईश्वर की आराधना नहीं करता।
17मोह-माया में फँसने के कारण इसके भीतर बहुत सारी मैल लगी हुई है।
18अहंकारी मनुष्य दरिया के तट, धार्मिक स्थलों व प्रदेशों में भटकता रहता है परन्तु वह अपने मन को अहंकार की अधिक मैल लगा लेता है॥३॥
19यदि वह सतिगुरु की सेवा करे तो उसकी मैल दूर हो जाती है।
20वह अहंत्व को मारकर हरि प्रभु में अपना चित्त लगाता है।
21भगवान निर्मल है और उस सत्य प्रभु को अहंकार की मैल नहीं लगती। जो व्यक्ति सत्य के साथ जुड़ जाता है वह अपनी मैल गंवा देता है॥४॥
22गुरु के बिना जगत् में अज्ञानता का घोर अंधकार है।
23ज्ञानहीन व्यक्ति अज्ञानता के अंधेरे में अंधा बना रहता है।
24उसका ऐसा हाल होता है जैसे विष्टा के कीड़े का होता है, जो विष्टा खाने का कार्य करता है और विष्टा में ही जलकर मर जाता है॥ ५॥
25जो व्यक्ति माया से मुक्त होकर गुरु की सेवा करता है, वही माया से मुक्त होता है।
26वह नाम द्वारा अपने अहंकार को दूर कर लेता है
27और रात-दिन पूज्य परमेश्वर की भक्ति करता रहता है। उसे पूर्ण भाग्य से गुरु मिलता है॥६॥
28भगवान स्वयं ही मनुष्य को क्षमा कर देता है और उसे गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।
29वह पूर्ण गुरु से नाम रूपी निधि प्राप्त कर लेता है।
30उसका मन सदैव ही सत्य नाम द्वारा प्रभु का सिमरन करता रहता है। फिर प्रभु का सिमरन करके वह अपना दुख मिटा लेता है।॥७॥
31भगवान स्वयं ही जीव के समीप रहता है, इसलिए उसे कहीं दूर मत समझो।
32गुरु के शब्द द्वारा भगवान को अपने मन में विद्यमान समझौ।
33हे नानक ! नाम से जीव को बड़ी शोभा प्राप्त होती है परन्तु नाम पूर्ण गुरु द्वारा ही मिलता है ॥८ ॥११॥१२॥
34माझ महला ३ ॥
35जो व्यक्ति इहलोक में सत्यवादी है, वह आगे परलोक में भी सत्यवादी है।
36वह मन सत्य है जो सत्य नाम में लीन रहता है।
37वह सत्यस्वरूप परमात्मा की आराधना करता है, सत्य नाम का वह जाप करता है और शुद्ध सत्य का ही वह कर्म करता है॥१॥
38मेरा तन, मन सर्वस्व उन पर न्यौछावर है, जो व्यक्ति सत्य-नाम को अपने ह्रदय में बसाते हैं।
39वे सत्य प्रभु की सेवा करते हैं, सत्य नाम में ही लीन रहते हैं और सत्य-परमेश्वर का ही यश गायन करते हैं॥ १ ॥ रहाउ ॥
40पण्डित धार्मिक ग्रंथ पढ़ते हैं परन्तु उन्हें आनंद नहीं मिलता।
41क्योंकि द्वैत भाव के कारण उनका ह्रदय सांसारिक पदार्थों में भटकता रहता है।
42माया-मोह की लगन ने उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है और दुष्कर्मों के कारण वे पश्चाताप करते हैं।॥२ ।
43यदि मनुष्य को सतिगुरु मिल जाए तो उसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है,
44फिर वह भगवान के नाम को अपने हृदय में बसाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं