सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1163 · Raag Bhairao · Bhagat Kabeer Ji

1तेंतीस करोड़ देवता जिसकी रसोई में भोजन का कार्य कर रहे हैं,

2करोड़ों नो ग्रह उसके दरबार में खड़े हैं,

3करोड़ों धर्मराज जिसके दरबान हैं।॥२॥

4करोड़ों पवनें जिसके चौबारे में घूमती हैं,

5करोड़ों नागराज उसकी सेज के लिए बिछे रहते हैं,

6करोड़ों समुद्र जिसका पानी भरते हैं और

7अठारह भार वाली करोड़ों वनस्पति उसकी रोमावली है॥३॥

8करोड़ों धन के देवता कुबेर उसके भण्डार भरते हैं,

9करोड़ों लक्ष्मियाँ उसके लिए श्रृंगार करती हैं।

10उसके दर्शन से करोड़ों पाप भी दूर हो जाते हैं,

11करोड़ों इन्द्र भी उसकी सेवा में तत्पर रहते हैं॥ ४॥

12जिसके छप्पन करोड़ द्वारपाल हैं,

13नगर-नगर उसका यश फैला रहे हैं।

14जटा-जटा खोलकर भयानक भूत-प्रेत, पिशाच इत्यादि उसकी आज्ञा में ही कार्यशील हैं।

15दरअसल ईश्वर करोड़ों शक्तियों के रूप में लीलाएँ करता रहता है।॥५॥

16करोड़ों जग जिसके दरबार में हैं,

17करोड़ों गंधर्व उसकी जय-जयकार करते हैं।

18करोड़ों रूप में विद्या की देवी सरस्वती उसका गुण गाती है,

19उस परब्रह्म का रहस्य कोई नहीं जानता॥६॥

20जिसकी बावन करोड़ रोमावली जितनी वानर सेना थी, जिस राम ने रावण सेना को छल लिया था,

21उस ईश्वर की ही पुराणों में करोड़ों हजारों कथाएँ हैं।

22उसी ने दुर्योधन के घमण्ड को चकनाचूर किया॥७॥

23करोड़ों कामदेव भी उसकी तुलना नहीं कर सकते,

24क्योंकि वह मन में ही वासना को चुरा लेता है।

25कबीर जी विनती करते हैं कि हे प्रभु ! सुनो,

26मैं तुझसे यही दान चाहता हूँ मुझे अभय पद (मोक्ष) प्रदान करो॥८॥२॥१८॥२०॥

27भैरउ बाणी नामदेउ जीउ की घरु १

28ੴ सतिगुर प्रसादि॥

29हे जिह्म ! तेरे सात टुकड़े कर दूँगा

30जो अगर तूने हरिनामोच्चारण ना किया तो ।॥१॥

31हे मनुष्य ! जिह्मा को हरिनाम में रंग लो,

32परमात्मा का भजन कर प्रेम रंग में रंग लो॥१॥ रहाउ॥

33हे जिव्हा ! तेरे अन्य काम झूठे हैं,

34केवल परमात्मा का सुमिरन करने से निर्वाण पद प्राप्त होता है।॥२॥

35असंख्य करोड़ों प्रकार की अन्य पूजा की जाए तो

36एक भी प्रभु-नाम के बराबर नहीं आती॥३॥

37नामदेव विनती करते हैं कि हे जिव्हा ! तेरे लिए यही उचित कार्य है कि

38अनंत रूप नारायण का नाम जपती रही॥४॥१॥

39जो पराया धन एवं पराई नारी का मोह छोड़ देता है,

40ईश्वर उसके निकट बसा रहता है॥१॥

41जो व्यक्ति परमात्मा का भजन नहीं करते,

42उनका तो मैं दर्शन ही नहीं करता॥ १॥ रहाउ॥

43जिनके अन्तर्मन में भेदभाव है,

44वे पुरुष तो ऐसे हैं, जैसे पशु होते हैं।॥२॥

45नामदेव विनती करते हैं कि नाक के बिना

46बत्तीस लक्षणों वाला पुरुष भी सुन्दर नहीं लगता॥३॥२॥

47लोटे में पानी लेकर नामदेव ने कपिला गाय को दुहा और कटोरे में दूध डालकर मन्दिर में ले आया॥१॥

48उसने प्रेमपूर्वक विनती की, हे गोविन्द ! दूध पी लो,

49पुनः प्रार्थना की, दूध पी लो, मेरा मन प्रसन्न हो जाएगा,

50यदि तूने दुग्धपान न किया तो घर में पिता जी मुझसे नाराज हो जाएंगे॥१॥ रहाउ॥

51सोने की कटोरी अमृतमय दूध से भरकर

52नामदेव ने भगवान की प्रतिमा के समक्ष रख दी॥२॥

53केवल एक तेरे जैसा भक्त ही मेरे हृदय में बसता है, नामदेव की श्रद्धा को देखकर ईश्वर ने मुस्कुराते हुए कहा॥३॥

54इस तरह भक्त नामदेव भगवान को दूध पिलाकर घर वापिस आ गया और

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं