गुरु ग्रंथ साहिब 1162 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji
1भगवान के भक्तगणों की सत्संगति करने एवं स्मरण की शक्ति से काल के भय का फन्दा कट जाता है।
2हे कबीर ! इस तरह दास किले पर चढ़कर अटल राज पा लेता है॥६॥ ६॥ १७॥
3गंगा मैया बड़ी गहन गंभीर है,
4जंजीर से बांधकर कबीर को वहाँ खड़ा कर फेंक दिया गया॥१॥
5जब मन नहीं डोलता तो फिर तन कैसे डर सकता है।
6कबीर का चित ईश्वर के चरण कमल में विलीन था॥१॥
7गंगा की लहरों से मेरी जंजीर टूट गई और
8कबीर मृगशाला पर बैठ गया॥२॥
9कबीर जी कहते हैं कि जहाँ कोई साथ नहीं देता,
10जल और थल में वहाँ परमात्मा ही रक्षा करता है॥३॥ १०॥ १८॥ (जब बादशाह सिकंदर लोधी द्वारा कबीर जी को गंगा में फेंका गया था, उस समय का वृत्तांत हैं]
11भैरउ कबीर जीउ असटपदी घरु २
12ੴ सतिगुर प्रसादि॥
13अपहुँच एवं दुर्गम (दशम द्वार रूपी) किले की रचना करके ईश्वर ने इसमें वास किया हुआ है और
14उसमें उसकी ज्योति का आलोक है।
15वहाँ बहाज्ञान रूपी बिजली चमकती है और आनंद बना रहता है
16जिस स्थान पर गोविन्द बसता है ।॥१॥
17यदि जीवात्मा की राम नाम में लगन लग जाए तो
18जन्म-मरण छूट जाता है और भ्रम भी भाग जाता है।॥१॥ रहाउ॥
19जिसके मन में जात-पात का प्रेम बना होता है,
20वह अहम्-भावना के गीत गाता रहता है।
21जिस स्थान पर प्रभु विद्यमान है,
22वहाँ अनाहत शब्द की झांकार होती रहती है॥२॥
23परमेश्वर खण्डों-मण्डलों की रचना करने वाला है,
24वह तीनों लोकों ब्रह्मा, विष्णु, शिव- त्रिदेवों तथा तीन गुणों का संहार करने वाला है।
25मन-वाणी से परे प्रभु अन्तर्मन में ही विद्यमान है,
26उस पृथ्वीपालक का रहस्य कोई नहीं पा सकता॥३॥
27केले, फूल, धूपबत्ती ये उसी का प्रकाश है,
28कमल के सौरभ में भी वही वास कर रहा है।
29बारह पंखुड़ियों वाले हृदय कमल में उसी का मन्तवय है,
30हर स्थान पर लक्ष्मीपति नारायण ही विद्यमान है॥४॥
31नीचे, ऊपर एवं मुख में उसकी ज्योति आलोकित हो रही है,
32शून्य मण्डल (दशम द्वार) में ईश्वर का आलोक स्थित है।
33वहाँ सूर्य एवं चांद नहीं,
34वहाँ भी आदिपुरुष मायातीत प्रभु आनंद कर रहा है॥५॥
35जो ब्रह्माण्ड में है, उसे पिण्ड में भी विद्यमान जानो।
36प्रभु नाम रूपी मानसरोवर में स्नान करो,
37मैं वही हूँ सोहम् जिसका जाप है,
38उस पर पाप एवं पुण्य लिप्त नहीं होता॥६॥
39ईश्वर वर्ण-अवर्ण, धूप अथवा छांव से परे है,
40गुरु की शरण बिना उसे कहीं भी पाया नहीं जा सकता।
41उसमें लगा ध्यान भंग नहीं हो सकता, इससे प्राणी का आवागमन छूट जाता है और
42वह नैसर्गिक ही शून्य समाधि में लवलीन रहता है।॥ ७॥
43अगर कोई मन में उसे जान ले तो
44जो बोलता है, वह पूरा हो जाता है।
45हे कबीर ! जो पुरुष प्रभु-ज्योति रूपी मंत्र के द्वारा मन को स्थिर कर लेता है,
46वह जगत से पार हो जाता है॥ ८॥१॥
47जिसका करोड़ों सूर्यो जितना प्रकाश है,
48करोड़ों महादेव और कैलाश पर्वत जिसमें व्याप्त हैं,
49करोड़ों दुर्गा देवियाँ जिसकी चरण-सेवा में लीन हैं,
50करोड़ों ब्रह्मा जिसके वन्दन में वेदों का उच्चारण करते हैं।॥१॥
51मैं तो केवल राम को ही चाहता हूँ,
52किसी अन्य देवता से कोई मतलब नहीं॥१॥ रहाउ॥
53करोड़ों चन्द्रमा जिसके दर पर चिराग करते हैं,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं