गुरु ग्रंथ साहिब 115 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1जो सतिगुरु की सेवा करता है, गुरु की वाणी से शोभा पा रहा है।
2जिस व्यक्ति ने भगवान का नाम अपने मन में बसा लिया है,
3निर्मल भगवान उसके मन की अहंकार रूपी मैल को दूर कर देता है और वह व्यक्ति सत्य के दरबार में शोभा प्राप्त करता है।॥२॥
4गुरु के बिना नाम की प्राप्ति नहीं होती।
5सिद्ध-साधक इससे विहीन होकर विलाप करते हैं।
6गुरु की सेवा के बिना सुख नहीं मिलता लेकिन बड़े सौभाग्य से सुकर्मो द्वारा गुरु जी मिलते हैं।॥३॥
7यह मन एक दर्पण है। कोई विरला गुरमुख ही उसमें अपने-आपको देखता है।
8यदि मनुष्य अपना अहंकार जला दे तो उसे अहंकार रूपी जंगाल नहीं लगता।
9जिस गुरमुख के मन में अनहद ध्वनि वाला निर्मल अनहद बजने लग जाता है, वह गुरु के शब्द द्वारा सत्य (परमेश्वर) में समा जाता है॥४॥
10सतिगुरु के बिना परमेश्वर किसी तरह भी देखा नहीं जा सकता।
11अपनी दया करके गुरदेव ने स्वयं ही मुझे ईश्वर के दर्शन करवा दिए हैं।
12ईश्वर अपने आप स्वयं ही सर्वव्यापक हो रहा है। ब्रह्म-ज्ञान द्वारा मनुष्य सहज ही उसमें लीन हो जाता है॥५॥
13जो व्यक्ति गुरमुख बन जाता है, वह एक ईश्वर के साथ स्नेह करता है।
14गुरु के शब्द द्वारा वह मोह माया रूपी भ्रम को जला फेंकता है।
15अपनी देहि में ही वह नाम रूपी वस्तु का व्यापार करता है और सत्यनाम की निधि पा लेता है॥६॥
16भगवान की महिमा-स्तुति करना ही गुरमुख की श्रेष्ठ करनी है।
17इसलिए गुरमुख मोक्ष द्वार को पा लेता है।
18प्रभु के स्नेह में रंगा हुआ वह रात-दिन उसकी कीर्ति का गायन करता रहता है और प्रभु उसे अपने आत्म-स्वरूप में आमंत्रित कर लेता है॥७॥
19सतिगुरु नाम का दाता है और सतिगुरु भगवान का मिलाया हुआ ही जीव को मिलता है।
20जिस व्यक्ति के पूर्ण भाग्य होते हैं, सतिगुरु उसके मन में नाम बसा देते हैं।
21हे नानक ! यदि सत्यस्वरूप परमात्मा की महिमा-स्तुति की जाए तो ही मनुष्य को नाम की शोभा प्राप्त होती है॥८॥९॥१०॥
22माझ महला ३ ॥
23यदि मनुष्य अपने अहंत्व को त्याग दे तो वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
24गुरु के शब्द द्वारा वह सत्य परमेश्वर में सुरति लगाता है।
25वह सत्य-नाम का व्यापार करता है और सत्य नाम रूपी धन ही एकत्रित करता है और सत्य नाम का ही वह दूसरों से व्यापार करवाता है॥१॥
26मैं तन-मन से उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो सदैव ही ईश्वर का यशोगान करते हैं।
27हे प्रभु ! मैं तेरा सेवक हूँ, तुम मेरे ठाकुर हो। तुम मुझे नाम की शोभा प्रदान करते हो॥१॥ रहाउ॥
28वह समय एवं क्षण सभी सुन्दर हैं,
29जब सत्यस्वरूप परमात्मा मेरे चित्त को अच्छा लगता है।
30सत्य प्रभु की सेवा-भक्ति द्वारा सच्ची महानता प्राप्त होती है किन्तु गुरु की दया से ही सत्यस्वरूप ईश्वर मिलता है।॥२॥
31प्रभु प्रीति का भोजन तभी मिलता है जब सतिगुरु जी परम प्रसन्न होते हैं।
32मनुष्य अन्य रस भूल जाता है जब वह हरि रस को अपने मन में बसा लेता है।
33प्राणी पूर्ण गुरु की वाणी से ही सत्य, संतोष एवं सहज सुख प्राप्त करता है॥३॥
34मूर्ख, अंधे, गंवार मनुष्य सतिगुरु की सेवा नहीं करते।
35तब वह किस तरह मोक्ष-द्वार को प्राप्त होंगे?
36वह बार-बार मरते और जन्म लेते हैं और पुनःपुनः जीवन-मृत्यु के बंधन में फँसकर आवागमन करते हैं। मृत्यु के द्वार पर वह चोटें खाते हैं।॥४॥
37वह अपने स्वरूप की तभी पहचान कर सकते हैं, यदि वह शब्द के स्वाद को जानते हो
38और निर्मल वाणी द्वारा नाम-सिमरन करते हों।
39गुरमुख सत्य परमेश्वर की भक्ति द्वारा सदैव सुख प्राप्त करते हैं और अपने चित्त में ईश्वर के नाम की नवनिधि को बसाते हैं।॥५॥
40वह स्थान अति सुन्दर है जो परमेश्वर के मन को लुभाता है।
41केवल वही सत्संग है, जिस में बैठकर मनुष्य हरि-प्रभु का यशोगान करता है।
42गुरमुख प्रतिदिन भगवान की महिमा-स्तुति करते रहते हैं और उनके मन में निर्मल नाद अर्थात् अनहद शब्द बजने लग जाता है।॥६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं