गुरु ग्रंथ साहिब 1159 · Raag Bhairao · Bhagat Kabeer Ji
1क्योंकि पण्डित एवं मुल्ला दोनों को त्याग दिया है॥१॥ रहाउ॥
2आप (अहम्) बुन बुनकर उसे ही पहन रहा हूँ।
3जहाँ अहम् नहीं, उसका ही गुण गाता हूँ॥२॥
4पण्डितों एवं मुल्लाओं ने जो लिख दिया है,
5उसे छोड़कर हम आगे चल पड़े हैं और कुछ भी साथ नहीं लिया॥३॥
6कबीर जी कहते हैं कि हे बन्धु ! हृदय में प्रेम भरकर देख लो,
7मन में खोज-खोज कर प्रभु से साक्षात्कार होता है।॥४॥७॥
8निर्धन को कोई आदर नहीं देता,
9बेशक वह लाखों प्रयास करे, तो भी धनवान् उसकी ओर ध्यान नहीं देते॥१॥ रहाउ॥
10अगर निर्धन धनवान् के पास जाता है तो
11आगे बैठा धनी व्यक्ति मुँह फेर लेता है॥१॥
12अगर धनवान् निर्धन के घर जाता है,
13तो वह आदरपूर्वक स्वागत् कर बुलाता है॥२॥
14दरअसल निर्धन एवं धनवान् दोनों भाई ही हैं,
15अतः प्रभु की रज़ा को टाला नहीं जा सकता॥३॥
16कबीर जी कहते हैं कि दरअसल निर्धन वही है,
17जिसके हृदय में प्रभु-नाम नहीं होता॥४॥ ८॥
18गुरु की सेवा व भक्ति से ही
19यह मानव-शरीर प्राप्त होता है।
20इस अमोल शरीर को पाने की देवता भी आकांक्षा करते हैं।
21सो इस शरीर में सदैव परमात्मा की उपासना एवं भजन करो॥ १॥
22भगवान का भजन करो, (ध्यान रखना) भूल मत जाना
23मानव शरीर का यही लाभ है॥१॥ रहाउ॥
24जब तक बुढ़ापा एवं रोग शिकार नहीं बनाता,
25जब तक मृत्यु शरीर को ग्रास नहीं बनाती,
26जब तक वाणी कमजोर नहीं होती,
27तब तक हे मन ! ईश्वर का भजन कर लो॥२॥
28हे भाई ! अब भजन न किया तो कब भजन होगा।
29अन्तिम समय आने पर भजन नहीं हो पाएगा।
30अतः जो कुछ करना है, अब ही पूरा कर लो,
31अन्यथा पछतावे के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा॥३॥
32सेवक वही है, जिसे परमात्मा ने सेवा में लगाया है,
33वही भगवान को पा लेता है।
34गुरु से साक्षात्कार होने पर मन के कपाट खुल जाते हैं और
35पुनः आवागमन नहीं होता॥४॥
36हे मनुष्य ! ईश्वर को पाने का यही तेरा सुनहरी अवसर है और यही तेरा शुभ समय है,
37दिल में विचार कर तू सच्चाई को समझ।
38हे मनुष्य ! अब यह तुझ पर निर्भर है, जीवन बाजी को जीतना है या हारना है
39कबीर जी कहते हैं कि मैंने पुकार-पुकार कर अनेक प्रकार से बता दिया है॥५॥१॥६॥
40हे जीव ! दसम द्वार में उत्तम बुद्धि स्थित है,
41उसे पा कर तुम विचार करो,
42इसके फलस्वरूप लोक परलोक का ज्ञान होगा।
43मैं-मेरा कर कर मरने का क्या फायदा है॥१॥
44आत्म-स्वरूप (सच्चे घर) पर मेरा ध्यान लगा हुआ है और
45राम नाम ही मेरा ब्रह्म ज्ञान है॥१॥ रहाउ॥
46अन्तर्मन को मूल द्वार प्रभु में बाँधा हुआ है।
47तमोगुणी रूपी रवि पर सतोगुणी रूपी चांद को रखा है।
48अज्ञान रूपी पश्चिम में ज्ञान रूपी सूर्य तप रहा है।
49अन्तर्मन में ईश्वर का ध्यान बस रहा है॥२॥
50पश्चिम द्वार की ओर शिला है और
51उस शिला पर एक अन्य खिड़की है ?
52उस खिड़की पर दसम द्वार है।
53कबीर जी कहते हैं कि उसका कोई अन्त अथवा आर-पार नहीं॥३॥२॥ १०॥
54सच्चा मुल्ला वही है, जो मन से लड़ता है और
55गुरु के उपदेश द्वारा काल से संघर्ष करता है।
56यमराज के मान का मर्दन करता है तो
57उस मुल्ला को मेरा सदा सलाम है॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं