सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1158 · Raag Bhairao · Bhagat Kabeer Ji

1प्रभु ही मेरे लिए नवनिधि है,

2यह सम्पति, मोह-प्रेम, स्त्री, धन इत्यादि तेरे ही दिए हुए हैं।॥१॥ रहाउ॥

3न ही साथ आता है और न ही साथ जाता है,

4फिर द्वार पर हाथी इत्यादि बांधने का क्या लाभ है॥२॥

5लंका सोने का दुर्ग थी,

6पर मूर्ख रावण भला क्या लेकर यहाँ से गया॥३॥

7कबीर जी कहते हैं कि प्रभु-गुणों का चिंतन करो अन्यथा

8जुआरी की मानिंद दोनों हाथ झाड़कर चले जाओगे॥४॥२॥

9(अपनी ही पुत्री को कामवासना की दृष्टि से देखने के कारण) ब्रह्मा मलिन है, (गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या से छलपूर्वक भोग के कारण) इन्द्र भी मैला है।

10सूर्य एवं चाँद दोनों ही मैले हैं।॥१॥

11यह पूरा संसार मलिनता मलता रहता है,

12एकमात्र ईश्वर ही निर्मल एवं पावनस्वरूप है, जिसका कोई अन्त अथवा आर-पार नहीं॥ १॥ रहाउ॥

13ब्रह्माण्डों के सम्राट भी कर्मो के कारण मलिन हैं,

14दिन-रात एवं तीस दिन भी मैले हैं।॥२॥

15हीरा एवं मोती मैले हैं।

16वायु, अग्नि और पानी भी मैले हैं।॥३॥

17शिवशंकर महेश मलिन हैं,

18सिद्ध-साधक एवं वेषधारी भी मैले ही मैले हैं॥४॥

19योगी, जंगम जटाधारी मलिन हैं,

20शरीर सहित आत्मा भी मैली है॥५॥

21कबीर जी कहते हैं कि वही व्यक्ति परवान होते हैं, जो भगवान को जानकर निर्मल रहते हैं॥ ६॥३॥

22मन को मक्का और शरीर को किबला बना लो,

23अन्तर्मन में बोलने वाला ही तेरा परम गुरु है॥१॥

24हे मुल्ला ! बाँग देकर नमाज़ पढ़, उस

25दस द्वार वाली शरीर रूपी मस्जिद में॥१॥ रहाउ॥

26क्रोध एवं भ्रम को बिस्मिल्लाह कहकर खत्म कर और

27पाँच विकारों को निगल कर संतोषवान बन जा॥२॥

28वास्तव में हिन्दू एवं मुसलमान का मालिक एक ईश्वर ही है,

29चाहे मुल्ला एवं शेख कुछ भी कहते एवं करते रहें।॥३॥

30कबीर जी कहते हैं कि मैं तो परमात्मा का दीवाना हो गया हूँ और

31आहिस्ता-आहिस्ता मन को मारकर सहज ही विलीन हो गया हूँ॥४॥ ४॥

32छोटी-सी नदिया गंगा के साथ विलीन हो गई, सो वह नदिया भी गंगा ही बन गई॥१॥

33राम की दुहाई देकर कबीर भी राम में विलीन हो गया और

34वह सत्यस्वरूप बन गया, अन्य कहीं नहीं जाता॥१॥ रहाउ॥

35पेड़ चन्दन की खुशबू के साथ लीन हुआ तो

36वह पेड़ भी चन्दन ही बन गया॥२॥

37पारस के संग मिलकर ताँबा भी बदला है,

38वह ताँबा (लोहा) सोना ही बन गया॥ ३॥

39संतों की संगत में कबीर भी बदल गया,

40अब कबीर भी राम का रूप हो गया॥४॥५॥

41माथे पर तिलक लगाया एवं हाथ में माला पकड़ ली,

42ऐसा भेष बनाकर लोगों ने राम को खिलौना ही मान लिया है॥१॥

43हे राम ! अगर मैं बावला हूँ, तो भी तेरा ही हूँ।

44अब लोग भला मेरा भेद कैसे जानें॥१॥रहाउ॥

45फूल-पते तोड़कर किसी देवी-देवता की पूजा नहीं करता,

46वास्तव में राम की भक्ति के बिना अन्य सेवा निष्फल है॥२॥

47सतगुरु की पूजा कर उसे सदा मनाता हूँ,

48क्योंकि ऐसी सेवा से ही दरबार में सुख मिलता है।॥३॥

49नि:संकोच लोग कबीर को बावला कहते हैं,

50मगर कबीर का रहस्य राम ही पहचान पाया है॥ ४॥६॥

51मोह-माया की तरफ से निर्लिप्त होकर जाति एवं कुल दोनों को भुला दिया है और

52शून्य समाधि में सहज आनंद पा रहे हैं।॥१॥

53अब हमारा कोई सांसारिक झगड़ा नहीं रहा,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं