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गुरु ग्रंथ साहिब 1156 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1जिसके हृदय में हरि का नाम है, उसे ही शीतल शान्ति प्राप्त होती है।

2हरिनामोपासना के बिना जीना धिक्कार है॥२॥

3जिस दिल में प्रभु-नाम अवस्थित है, वही जीवन्मुक्त होता है।

4जिसके हृदय में हरि-नाम है, उसके पास सब युक्तियां हैं।

5नौ-निधियाँ उसे ही प्राप्त होती हैं, जिसके हृदय में राम नाम है।

6प्रभु-नाम के बिना भ्रम में पड़कर आवागमन बना रहता हैI॥३॥

7जिसके हृदय में हरि-नाम है, उसे कोई परवाह नहीं होती।

8हृदय में नाम बसाने वाला सदा लाभ पाता है।

9जिसके हृदय में नाम विराजता है, उसका परिवार सुख-समृद्धि पाता है।

10प्रभु-नाम के बिना मनुष्य मनमुखी गंवार माना जाता है।॥४॥

11जिसके हृदय में राम नाम है, उसका आसन अटल है,

12जिसके हृदय में प्रभु का नाम है, वही राजसिंहासन पर सुशोभित होता है।

13वही सच्चा साहूकार है, जिसके हृदय में परमात्मा का नाम है।

14नामविहीन व्यक्ति की कोई इज्जत नहीं और उस पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता॥५॥

15जिसके हृदय में प्रभु का नाम है, वह सब में प्रसिद्ध हो जाता है और

16वही परमपुरुष विधाता रूप है।

17जिसके हृदय में हरि-नाम है, वही सबसे ऊँचा होता है,

18परन्तु नाम से विहीन रहकर प्राणी योनि-चक्र में भटकता रहता है॥ ६॥

19जिसके हृदय में परमात्मा का नाम है, उसे संसार में व्याप्त प्रभु ही दृष्टिगत होता है और

20उसका अज्ञान का अंधेरा मिट जाता है।

21जिसके हृदय में नाम है, वही पुरुष स्वीकार होता है और

22हरि-नाम के बिना पुनः आवागमन में पड़ा रहता है।॥७॥

23प्रभु-नाम वही पाता है, जिस पर कृपालु होता है,

24वह साधु पुरुषों की संगत में भगवान के दर्शन करता है।

25उसका आवागमन निवृत हो जाता है और तमाम सुख प्राप्त करता है।

26हे नानक ! यूं आत्म-तत्व परम-तत्व में ही विलीन हो जाता है॥ ८॥ १॥४॥

27भैरउ महला ५॥

28जिस परमात्मा ने करोड़ों विष्णु अवतार उत्पन्न किए,

29धर्म का आचरण करने के लिए करोड़ों ब्रह्माण्ड बनाए,

30करोड़ों शिवशंकर उत्पन्न कर उन्हें स्वयं में विलीन कर लिया और

31करोड़ों ही ब्रह्मा जगत को बनाने के लिए लगाए हुए हैं।॥१॥

32हमारा मालिक परमेश्वर ऐसा है कि

33उसके गुणों का विस्तार मैं व्यक्त नहीं कर सकता॥१॥ रहाउ॥

34हरदम प्रभु की सेवा में तल्लीन माया भी करोड़ों हैं,

35वह करोड़ों जीवों में रमण कर रहा है,

36हे स्वामी ! ऐसी सृष्टियाँ भी करोड़ों हैं, जो तेरे अंगों में तल्लीन हैं,

37करोड़ों भक्त उस परमात्मा के संग बसते हैं।॥२॥

38करोड़ों छत्रपति तेरी वंदना करते हैं,

39करोड़ों इन्द्र तेरे द्वार पर हाथ जोड़कर खड़े हैं,

40करोड़ों वैकुण्ठ जिसकी दृष्टि में हैं,

41करोड़ों ही उसके नाम हैं, जिनकी महिमा अमूल्य है॥३॥

42जिसके करोड़ों नाद गूंजते रहते हैं,

43जिसकी विस्मयपूर्ण करोड़ों कर्मभूमियाँ एवं लीलाएँ हैं।

44करोड़ों शिव-शक्तियाँ उसकी आज्ञा का पालन करती हैं,

45वह सर्वशक्तिमान करोड़ों जीवों को आसरा दे रहा है॥४॥

46करोड़ों तीर्थ जिसके चरणों में तल्लीन हैं,

47करोड़ों लोग जिसका पावन नाम जपते हैं,

48करोड़ों पुजारी उसकी पूजा-अर्चना करते हैं,

49करोड़ों ही विस्तार उस परमात्मा के हैं, अन्य कोई नहीं॥५॥

50करोड़ों पुण्यात्माएँ निरंकार की महिमा गा रही हैं।

51ब्रह्म के अंश करोड़ों ही उसकी स्तुति करते हैं।

52वह अखिलेश्वर पल में करोड़ों प्रलय अथवा उत्पतियाँ करने में सर्वशक्तिमान है।

53हे परमात्मा ! तेरे करोड़ों गुणों को गिना नहीं जा सकता॥६॥

54करोड़ों ज्ञानवान ज्ञान-चर्चा करते हैं,

55करोड़ों ध्यानशील उसके ध्यान में लीन होते हैं,

56उसे पाने की उमंग में करोड़ों तपस्वी उसकी तपस्या करते हैं और

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं