गुरु ग्रंथ साहिब 1153 · Raag Bhairao
1रागु भैरउ महला ५ पड़ताल घरु ३
2ੴ सतिगुर प्रसादि॥
3हे प्रभु ! तू कृपालु एवं हमारा पालनहार है, मैं तुम्हारे कौन से गुण की बात करूँ।
4तू सबका मालिक है, तेरे अनेक रंग हैं, बहुत-सी मन की उमंगें हैं॥१॥ रहाउ॥
5संसार में अनेकों ही ज्ञानवान, ध्यानशील, जाप जपने वाले जापक एवं तपस्वी हैं,
6अनेकों ही मधुर स्वर सहित तेरे गुण गाने वाले हैं और अनेकों मुनि तेरे ध्यान में लीन रहने वाले हैं।॥१॥
7अनेकों ही तेरी खातिर गाते हैं, पल-पल वाद्य बजाते हैं, अनेकों ही खूब मजा लेकर तेरा नाम लेते हैं, तेरा यश सुनने से अनेकानेक रोग दोष मिट जाते हैं।
8हे नानक ! ईश्वर की उपासना में ही तीर्थ, षट कर्म, व्रत-उपवास, पूजा-अर्चना, यात्रा इत्यादि सब पुण्य-फल की प्राप्ति होती है॥२॥१॥ ५७॥ ८॥ २१॥ ७॥ ५७॥ ६३॥
9भैरउ असटपदीआ महला १ घरु २
10ੴ सतिगुर प्रसादि॥
11गुरु के सद्विचार द्वारा यह रहस्य मालूम होता है कि आत्मा में परमात्मा और परमात्मा में ही आत्मा है।
12उसकी अमृत वाणी से शब्द की पहचान होती है, जो दुःखों को काट देती है और अहम् को मार देती है॥१॥
13हे नानक ! अहम् का रोग बहुत बुरा है।
14जहाँ भी देखा जाए वहाँ एक दर्द सता रहा है। यदि परमेश्वर क्षमा करे तो निदान हो सकता है॥ १॥ रहाउ॥
15जब परखने वाला स्वयं भले-बुरे की परख कर लेता है तो उसे पुनः परीक्षण के लिए सूए पर नहीं चढ़ाया जाता।
16जिन पर उसकी करुणा-दृष्टि हो गई, उसका गुरु से साक्षात्कार हो गया और प्रभु की रज़ा सत्य सिद्ध हुई॥२॥
17पवन, पानी एवं अग्नि रोगग्रस्त है और भोग पदार्थों सहित पूरी धरती रोगी है।
18माता-पिता, माया, शरीर रोगी हैं एवं परिवार से जुड़े सदस्य एवं नातेदार भी रोगग्रस्त हैं॥३॥
19ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश सहित पूर् संसार ही अहम् भावना के कारण रोगी है।
20जिन्होंने शब्द-गुरु का चिंतन कर परमपद को समझ लिया है, वे संसार से मुक्त हो गए हैं।॥४॥
21सात समुद्र, नदियाँ एवं अनेक खण्ड एवं पाताल रोगों से भरे हुए हैं।
22मगर प्रभु के भक्त ही वास्तव में सुखी हैं चूंकि हर जगह पर प्रभु कृपा करता है॥५॥
23छः दर्शनों को मानने वाले वेषधारी, अनेक हठी भी रोगों के शिकार हैं।
24वेद-कतेब बेचारे भी क्या करें जब जीव एक ईश्वर के रहस्य को नहीं बूझते॥६॥
25मीठे रस खाने से भी रोग ही भर जाते हैं और कन्दमूल सेवन करने से भी सुख प्राप्त नहीं होता।
26प्रभु-नाम को भुलाकर जो अन्य रास्ते पर चलते हैं, अन्तिम समय पछताते ही हैं।॥७॥
27तीथों पर भ्रमण करने से रोग नहीं छूटते और पढ़ने से वाद-विवाद का रोग लग जाता है।
28दुविधा का रोग सबसे बड़ा है और मनुष्य केवल धन का मोहताज बना रहता है।॥ ८॥
29जो गुरु के सान्निध्य में निष्ठापूर्वक परमात्मा की प्रशंसा करता है, उसका रोग दूर हो जाता है।
30गुरु नानक का फुरमान है कि जिन पर परमात्मा की कृपा होती है, वे भक्तजन नित्य निर्मल रहते हैं।॥ ९॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं