गुरु ग्रंथ साहिब 1151 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji
1पल में उनके भ्रम-भय नष्ट हो जाते हैं,
2क्योंकि परब्रह्म मन में आ बसता है॥१॥
3ईश्वर संतों का सदा सहायक है,
4घर-बाहर सब में पूर्ण रूप से परमेश्वर ही व्याप्त है॥१॥ रहाउ॥
5मेरा धन, माल, यौवन एवं जीवन-युक्ति सब परमात्मा ही है और
6मेरे जीवन-प्राणों का नित्य पालन पोषण करता है।
7वह अपने दास की हाथ देकर रक्षा करता है और
8पल भर भी साथ नहीं छोड़ता, सदैव साथ रहता है।॥२॥
9ईश्वर-सा प्रियतम दूसरा कोई नहीं,
10वह सच्चा प्रभु ही हमारा ध्यान रखता है।
11माता-पिता, पुत्र एवं बंधु परमात्मा ही है,
12युग-युगांतर से भक्त उसके ही गुण गा रहे हैं।॥३॥
13हमें उसका ही आसरा है और हमारे मन को प्रभु का ही बल है,
14उस एक के सिवा दूसरा अन्य कोई नहीं।
15नानक के मन में यही बल-शक्ति है कि
16प्रभु हमारे सब कार्य संवारेगा॥ ४॥ ३८॥ ५१॥
17भैरउ महला ५॥
18परमात्मा का नाम-स्मरण करने से भय भी डर गया है।
19तीन गुणों की सब व्याधियाँ मिट गई हैं और दास के सब कार्य पूर्ण हो गए हैं।॥१॥ रहाउ॥
20परमात्मा के भक्त सदा उसके गुण गाते हैं और उनको ही पूर्ण वैकुण्ठ धाम मिला है।
21भक्तों का दर्शन तो यमराज भी दिन-रात चाहता है और पावन होता है।॥१॥
22काम, क्रोध, लोभ, मद, निंदा एवं अभिमान साधु-संगत में मिट जाता है।
23ऐसे संत-पुरुषों से जिनकी भेंट होती है, वे भाग्यशाली हैं और नानक उन पर सदैव कुर्बान है॥२॥३९॥५२॥
24भैरउ महला ५॥
25जो कामादिक पाँच विकारों को मन में धारण करता है, वही पंच मजमी होता है।
26वह नित्य उठकर मुँह से झूठ बोलता है,
27ललाट पर तिलक व चक्रादि पुजारी होने का ढोंग करता है,
28मगर विधवा औरत की तरह पछताता मर मिटता है॥१॥
29प्रभु के नाम बिना सब झूठ ही झूठ है,
30पूरे गुरु के बिना मुक्ति नसीब नहीं होती और मायावी जीव प्रभु-दरबार में लुट जाता है।॥१॥ रहाउ॥
31वह मलिन पुरुष ईश्वर की कुदरत को नहीं जानता।
32स्थान की लीपा-पोती करने पर भी ईश्वर इसे पावन-स्थल नहीं मानता।
33जिसका अन्तर्मन मैला है और बाहर से शरीर को रोज़ धोता है,
34वह सच्चे दरबार में अपनी इज्जत खो देता है॥ २॥
35वह धन-दौलत के लिए अनेक उपाय करता है और
36कभी सीधा पांव नहीं रखता अपितु बुरे काम ही करता है।
37जिसने बनाया है, उसे याद नहीं करता और
38मुँह से सदा झूठ ही बोलता रहता है॥३॥
39जिस पर ईश्वर कृपा करता है,
40उसका व्यवहार साधु पुरुषों के संग हो जाता है।
41गुरु नानक का फुरमान है कि जिसका हरि-नाम भक्ति से रंग लग जाता है,
42उस व्यक्ति को कोई मुश्किल पेश नहीं आती॥४॥ ४०॥ ५३॥
43भैरउ महला ५॥
44निंदक मनुष्य को समूचा संसार ही धिक्कारता एवं छि: छि: करता है,
45निंदक का व्यवहार झूठा ही होता है और
46उसका आचरण भी मैला होता है।
47मगर भगवान अपने दास को इस (निंदा) से बचाकर रखता है॥१॥
48निंदक मनुष्य निंदकों के संग रहकर मर जाता है।
49परब्रह्म परमेश्वर अपने भक्तों की रक्षा करता है और निंदक के सिर पर काल कड़कता है॥१॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं