सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1150 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1वह सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

2आठ प्रहर भगवान के गुण गाओ

3सतगुरु ने यही पूर्ण मंत्र दिया है॥१॥

4जिसका प्रभु-नाम से अटूट प्रेम है, वही भाग्यशाली है,

5उसकी संगत करके संसार का भी उद्धार हो जाता है।॥१॥ रहाउ॥

6वही ज्ञानवान है, जो ईश्वर का स्मरण करता है।

7जिसके पास विवेक बुद्धि है, वही धनवान है।

8जो प्रभु की उपासना करता है, वही कुलीन है।

9जिसे आत्म-ज्ञान की पहचान होती है, वही इज्जतदार है॥२॥

10गुरु की कृपा से जिसने परमपद पा लिया है,

11वह प्रभु के गुण गाता है, दिन-रात उसी के ध्यान में लीन रहता है।

12उसकी आशाएँ पूर्ण हो जाती हैं और सब बन्धन टूट जाते हैं।

13उसके हृदय में प्रभु के चरण बने रहते हैं।॥३॥

14नानक फुरमाते हैं कि जिसका पूर्ण भाग्य होता है,

15वही व्यक्ति प्रभु की शरण में आता है।

16वह आप तो पवित्र होता ही है, सबको पावन कर देता है और

17जिव्हा से राम नाम रूपी रसायन को पहचान लेता है॥४॥ ३५॥ ४८॥

18भैरउ महला ५॥

19प्रभु का नाम लेने से कोई रुकावट पेश नहीं आती,

20नाम सुनने से तो यम भी दूर से भागने लगता है।

21प्रभु-नाम की वंदना से सब दुःख नाश हो जाते हैं,

22नाम जपने से प्रभु-चरणों में निवास हो जाता है।॥१॥

23प्रभु की भक्ति हर विघ्न दूर करती है,

24परमात्मा का भजन करो, आनंदपूर्वक प्रभु का ही गुणगान करो।॥१॥ रहाउ॥

25ईश्वर का स्मरण करने से कोई बुरी नजर नहीं लगती,

26ईश्वर का स्मरण करने से भूत-प्रेत दुखी नहीं करते।

27परमात्मा के स्मरण से मान-मोह नहीं बांध पाता और

28परमात्मा का सिमरन करने से गर्भ योनि से छुटकारा हो जाता है।॥२॥

29दिन-रात अथवा सुबह-शाम ईश्वर स्मरण का ही शुभ समय है,

30ईश्वर का स्मरण अनेक लोगों में कोई अकेला ही करता है।

31छोटी-बड़ी जाति का कोई भी व्यक्ति परमात्मा का जाप कर सकता है,

32जो जाप करता है, उसकी मुक्ति हो जाती है॥३॥

33साधुजनों के संग प्रभु का नाम जपना चाहिए,

34इससे प्रभु-नाम का पूर्ण रंग चढ़ जाता है।

35हे नानक ! प्रभु ने कृपा करके ऐसा वर दिया है कि

36वह श्वास-श्वास प्रभु का स्मरण करता है॥४॥ ३६॥ ४६॥

37भैरउ महला ५॥

38वेद एवं शास्त्र वह स्वयं ही है और

39वह स्वयं ही घट-घट का रहस्य जानता है।

40वह ज्योति स्वरूप है, रचना रूपी सब वस्तुएँ उसी की हैं।

41वह सब कुछ करने में पूर्ण समर्थ है॥१॥

42हे मेरे मन ! प्रभु की ओट लो,

43गुरु के द्वारा उसके चरण-कमल की आराधना करो, इससे दुश्मन एवं कोई दुःख पास नहीं आता॥१॥ रहाउ॥

44वन, वनस्पति, तीनों लोकों का सार वह स्वयं ही है और

45पूरा संसार उसी के सूत्र में पिरोया हुआ है।

46वह स्वयं ही शिव और शक्ति का संयोग करवाने वाला है।

47वह स्वयं ही भोगने वाला है और स्वयं ही निर्लिप्त है॥२॥

48जिधर भी दृष्टि जाती है, उधर वही है,

49उसके सिवा अन्य कोई नहीं।

50प्रभु-नाम के रंग में लीन रहकर संसार-सागर को पार किया जा सकता है,

51अतः साधु पुरुषों के संग नानक उसके ही गुण गाता है॥३॥

52मुक्ति, भुक्ति एवं युक्ति उसी के वश में है और

53उसके भक्त के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं।

54हे नानक ! वह कृपा कर जिस पर प्रसन्न हो जाता है,

55वही व्यक्ति धन्य है॥४॥ ३७॥ ५०॥

56भैरउ महला ५॥

57भक्तों के मन में ईश्वर के बसने से आनंद ही आनंद बना रहता है।

58उनकी सब चिन्ताएँ नष्ट हो जाती हैं और वे स्थिरचित हो जाते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं