गुरु ग्रंथ साहिब 114 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1दिन-रात वह सदा ही प्रभु के भय में रहता है और यम के भय को मिटा कर वह अपने संशय को निवृत्त कर देता है॥५ ॥
2जो व्यक्ति अपने मन का भ्रम दूर कर देता है, वह सदैव ही सुखी रहता है।
3गुरु की कृपा से वह परमपद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है।
4निर्मल वाणी से उसका अन्तर्मन भी निर्मल हो जाता है और वह सहज ही भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता है॥६॥
5पण्डित स्मृतियों, शास्त्रों एवं वेदों की कथा लोगों को सुनाता रहता है
6परन्तु वह स्वयं ही भ्रम में पड़कर भटकता रहता है और परम तत्व ब्रह्म को नहीं जानता।
7सतिगुरु की सेवा किए बिना उसको सुख नहीं मिलता और वह दुःख ही दु:ख अर्जित करता है॥७॥
8परमात्मा स्वयं ही सब कुछ करता है। फिर किसी को कोई क्या समझा सकता है?
9किसी को समझाने की तभी आवश्यकता है यदि वह भूल करता हो।
10हे नानक ! परमात्मा स्वयं ही सब कुछ करता और जीवों से करवाता है। नाम सिमरन करके जीव नाम में ही लीन हो जाता है ॥८॥७ ॥८॥
11माझ महला ३ ॥
12भगवान स्वयं ही जीव को सहज स्वभाव द्वारा अपने प्रेम में रंग देता है
13और गुरु के शब्द द्वारा अपने प्रेम का रंग चढ़ा देता है।
14उसका मन एवं तन प्रेम में रंग जाता है और उसकी जिव्हा पोस्त के पुष्प की भाँति लाल वर्ण धारण कर लेती है। भगवान उसे यह नाम रंग उसके मन में अपना भय एवं प्रेम उत्पन्न करके चढ़ाता है॥१ ॥
15मैं उन पर न्यौछावर हूँ मेरा जीवन उन पर कुर्बान है, जो निडर परमात्मा को अपने ह्रदय में बसाते हैं।
16गुरु की दया से वे निर्भय परमेश्वर को स्मरण करते हैं और उनकी वाणी द्वारा विषैले संसार सागर को पार कर जाते हैं।॥१॥ रहाउ ॥
17मनमुख मूर्ख व्यक्ति चतुरता करता है।
18अपने स्नान व स्वच्छता के बावजूद वह स्वीकृत नहीं होता।
19जिस तरह वह जगत् में आया था, वैसे ही पापों पर पश्चाताप करता हुआ चला जाता है।॥२॥
20ज्ञानहीन मनमुखों को कुछ भी ज्ञान नहीं होता
21क्योंकि वह प्रारम्भ से ही अपनी किस्मत में अपनी मृत्यु के लेख लिखवा कर जगत् में आते हैं। वे अपने जीवन-मनोरथ को नहीं समझते।
22मननुख कर्म करते रहते हैं परन्तु उन्हें नाम प्राप्त नहीं होता। नामविहीन होकर वह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं॥३ ॥
23सत्यनाम की साधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
24पूर्णगुरु के द्वारा मोक्ष द्वार मिलता है।
25गुरु जी प्रतिदिन अपनी वाणी द्वारा सिक्खों को नाम सुनाते रहते हैं और वह शब्द द्वारा सत्य प्रभु के प्रेम में मग्न हुए नाम रंग में लीन हो जाते हैं।॥४॥
26गुरमुख की रसना हरि-रस में रंग जाती है और प्रभु से ही प्यार करती है।
27सहज स्वभाव ही उसका मन एवं तन प्रभु प्रेम से मुग्ध हो जाता है।
28वह सहज ही अपने प्रियतम प्रभु को पा लेता है। फिर वह सहज ही सहज अवस्था में समा जाता है।॥५ ।
29जिस मनुष्य में प्रभु का प्रेम विद्यमान है। वह ईश्वर का यशोगायन करता है
30और गुरु के शब्द द्वारा सहज ही आत्मिक आनंद में समा जाता है।
31मैं सदैव हीउन पर कुर्बान जाता हूँ, जो अपने मन को गुरु की सेवा में समर्पित करते हैं।॥६॥
32वही व्यक्ति सत्यवादी है जो सत्य नाम द्वारा सत्य प्रभु से विश्वस्त हो जाता है।
33गुरु की कृपा से उसका हृदय नाम-रस से भीग जाता है।
34वह साध संगत रूपी सुन्दर स्थान पर बैठकर भगवान की महिमा-स्तुति ही करता है। भगवान स्वयं ही उस पर कृपा करके उसके मन में यह श्रद्धा पैदा करता है कि सत्य का गुणानुवाद ही सत्यकर्म है॥७॥
35जिस पर प्रभु अपनी दया-दृष्टि करता है, वह उसके नाम को पाता है।
36गुरु की दया से उसका अहंकार निवृत्त हो जाता है।
37हे नानक ! जिसके मन में ईश्वर का नाम निवास करता है, वह सत्य दरबार में बड़ी शोभा पाता है॥८॥८॥९ ॥
38माझ महला ३ ॥
39सतिगुरु की सेवा करने से बड़ी शोभा प्राप्त होती है
40और पूज्य परमेश्वर अकस्मात ही ह्रदय में आकर निवास करता है।
41हरि-परमेश्वर एक फलदायक पौधा है जो इसके नाम रूपी अमृत का पान करता है, उसकी प्यास बुझ जाती है॥१॥
42मेरा तन, मन एवं प्राण उस प्रभु पर न्यौछावर हैं जो जीवों को सत्संग में मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।
43भगवान स्वयं ही जीवो को सत्संग में मिलाता है और गुरु के शब्द द्वारा जीव भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता है॥१॥ रहाउ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं