सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1149 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1जड़ के बिना भला शाखा कैसे हो सकती है॥१॥

2हे मेरे मन ! गुरु-परमेश्वर का मनन करो,

3वह जन्म-जन्मांतर की मैल उतार कर और सब यन्घनों को काटकर ईश्वर के संग मिला देता है।१॥ रहाउ॥

4तीर्थों पर स्नान करने से पत्थर-दिल कैसे शुद्ध हो सकता है,

5मन को तो अहम् की मैल लगी रहती है।

6करोड़ों कर्मकाण्ड भी मात्र बन्धनों का कारण हैं,

7ईश्वर के भजन बिना कमों का गठ्ठर व्यर्थ है॥२॥

8कुछ भोजन इत्यादि खाए बिना भूख दूर नहीं होती,

9जब कोई रोग दूर हो जाता है तो ही दुःख समाप्त होता है।

10जीव केवल काम, क्रोध, लोभ, मोह में लिप्त रहता है,

11जिस प्रभु ने बनाया है, उसे वह जानता ही नहीं॥३॥

12साधु पुरुष एवं हरि-नाम धन्य है।

13आठ प्रहर परमात्मा का संकीर्तन एवं गुणगान करो।

14परमात्मा की भक्ति धन्य है और भक्ति करनेवाला भी धन्य है।

15नानक तो अपार प्रभु की शरण में है॥४॥३२॥ ४५॥

16भैरउ महला ५॥

17अगर गुरु प्रसन्न हो जाए तो सब भय दूर हो जाते हैं और

18मन में पावन हरिनाम स्थित हो जाता है।

19दीनदयाल प्रभु सदा कृपा करता है,

20जिससे सारे जंजाल नष्ट हो जाते हैं।॥१॥

21स्वाभाविक सुख एवं परमानंद बना रहता है

22साधु पुरुषों के संग जिव्हा से अमृतमय हरि नाम जपने से सब भय-भ्रम मिट जाते हैं ।॥१॥ रहाउ॥

23अगर प्रभु-चरणों से प्रेम लग जाए तो

24पल में अभिमान रूपी महाप्रेत नष्ट हो जाता है।

25आठ प्रहर ईश्वर का जाप करो,

26वह गुरु-परमेश्वर स्वयं रक्षा करने वाला है॥२॥

27वह अपने सेवकों का सदा पालन-पोषण करता है और

28भक्तजनों का हर सॉस से ख्याल रखता है।

29मनुष्य की क्या हैसियत है,

30वह तो हाथ देकर यम से रक्षा करता है॥३॥

31तब शोभा और आचरण निर्मल हो जाता है

32जब मन में परब्रहा याद आता है ।

33हे नानक ! गुरु ने कृपा कर दान दिया है और

34नाम रूपी सुखों का भण्डार पा लिया है॥४॥ ३३॥ ४६॥

35भैरउ महला ५॥

36मेरा गुरु सब कुछ करने-कराने में समर्थ है,

37आत्मा-प्राणों को सुख देने वाला है,

38वह सब भय नष्ट करने वाला एवं अविनाशी है।

39उसके दर्शन करने से सब दुःख दूर हो जाते हैं।॥१॥

40जहाँ कहीं तेरी शरण देखता हूँ,

41मैं सतगुरु के चरणों पर कुर्बान जाता हूँ॥१॥ रहाउ॥

42गुरुदेव से साक्षात्कार कर सब कार्य पूर्ण हो गए हैं,

43वह सब फल प्रदान करने वाला है और सेवा भी पावन है।

44हाथ देकर उसने अपने दास को बचा लिया है और

45राम नाम हृदय में बसा दिया है।॥२॥

46भक्तों के मन में सदा आनंद बना रहता है और कोई गम नहीं होता।

47दुःख-दर्द एवं रोग भी उन्हें नहीं छूता।

48सब कुछ तेरा है और तू ही करने वाला है

49परब्रह्म गुरु अगम्य हे॥३॥

50तेरी शोभा अति निर्मल है,और वाणी आश्चर्यमय है।

51पूर्ण परब्रह्म के मन को भी अच्छी लगती है।

52जमीन, आसमान एवं जल में वही व्याप्त है,

53हे नानक ! संसार में सब कुछ प्रभु ही कर रहा है॥ ४॥ ३४॥ ४७॥

54भैरउ महला ५॥

55यह मन-तन प्रभु-चरणों में ही लीन है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं