गुरु ग्रंथ साहिब 1148 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु के सान्निध्य में हरि-नाम का जाप किया है।
2प्रभु-नाम में ऐसा रंग लगा है कि सब चिन्ताएँ भूल चुकी हैं और
3जन्म-जन्मांतर का अज्ञान में सोया मन जागृत हो गया है॥१॥
4अपनी कृपा कर सेवा में लगाया है,
5साधु जनों के साथ सर्व सुख प्राप्त हुए हैं।॥१॥ रहाउ॥
6शब्द-गुरु के द्वारा सब रोगों-दोषों का निवारण किया है और
7हरिनाम रूपी औषधि मन में स्थित है।
8गुरु से भेंट कर मन खिल गया है,
9भगवन्नाम सर्व सुखों का भण्डार है॥२॥
10जन्म-मरण की यम की पीड़ा मिट गई है,
11साधु-पुरुषों की संगत में उलटा पड़ा हृदय खिल गया है।
12ईश्वर के गुण गाते निश्चल शान्ति मिली है और
13सभी मनोरथ पूर्ण हुए हैं।॥३॥
14दुर्लभ शरीर का संसार में आना परवान हुआ है,
15ईश्वर का नाम जपते हुए जन्म सफल हो गया है।
16नानक का कथन है कि प्रभु ने ऐसी कृपा की है कि
17साँस-ग्रास से हरि-हरि ही जपता रहता हूँ॥४॥ २६॥ ४२॥
18भैरउ महला ५॥
19जिसका नाम सबसे ऊँचा है,
20सदैव उसके गुण गाओ।
21जिसे स्मरण करने से सब दुःख दूर हो जाते हैं और
22मन में सुख ही सुख बस जाते हैं।॥१॥
23हे मन ! उस परमात्मा का स्मरण कर, एकमात्र वही परम-सत्य है,
24इसके फलस्वरूप लोक-परलोक में तुम्हारी गति होगी॥१॥रहाउ॥
25पावनस्वरूप परमेश्वर ही सृजनहार है,
26वही जीव-जन्तुओं को रोजी रोटी देता है।
27वह इतना दयालु है कि करोड़ों गलतियों को पल में क्षमा करने वाला है।
28उसकी भक्ति करने से निस्तार हो जाता है॥२॥
29प्रभु-नाम ही सच्चा धन है और इसकी कीर्ति भी शाश्वत है।
30पूर्ण गुरु से यही निश्चल शिक्षा प्राप्त की है।
31परमात्मा कृपा करके जिसकी रक्षा करता है,
32उसका अज्ञान रूपी अंधेरा मिट जाता है॥३॥
33हमारा परब्रह्म में ही ध्यान लगा हुआ है,
34वह पूर्ण रूप से संसार के कण-कण में व्याप्त है।
35नानक पर गुरु दयालु हो गया है और
36सब भ्रम-भय मिटाकर उसे ईश्वर मिल गया है॥४॥ ३०॥ ४३॥
37भैरउ महला ५॥
38जिसे स्मरण करने से मन में आलोक हो जाता है,
39दुःख-क्लेश मिट जाते हैं और परम सुख बना रहता है।
40यह उसे प्राप्त होता है जिसे प्रभु देता है,
41वह पूर्ण गुरु की सेवा पाता है॥१॥
42हे प्रभु ! तेरा नाम सर्व सुख प्रदान करनेवाला है,
43अतः आठ प्रहर मेरा मन तेरे ही गुण गाता है॥१॥ रहाउ॥
44वह मनवांछित फल पाता है,
45जो प्रभु का नाम मन में बसा लेता है।
46परमात्मा का भजन करने से आवागमन से मुक्ति प्राप्त होती है और
47प्रभु की भक्ति में ध्यान लगा रहता है॥२॥
48काम-क्रोध व अहंकार नष्ट हो जाता है और
49मोह-माया का प्यार टूट जाता है।
50उसे प्रभु का आसरा दिन-रात बना रहता है,
51परब्रह्म जिसे देन प्रदान करता है॥३॥
52संसार का स्वामी परमेश्वर करने-कराने में समर्थ है,
53वह सब जीवों के मन की भावना को जाननेवाला है।
54नानक की विनती है कि हे प्रभु ! कृपा करके अपनी सेवा में लगा लो,
55चूंकि यह दास तेरी शरण में आया है॥४॥३१॥४४॥
56भैरउ महला ५॥
57जो व्यक्ति परमेश्वर का नाम नहीं लेता, उसे शर्म में डूब मरना चाहिए।
58नाम से विहीन रहकर भला सुखी कैसे रह सकता है।
59परमात्मा का स्मरण छोड़कर परमगति की आकांक्षा करता है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं