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गुरु ग्रंथ साहिब 1147 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1नानक की विनती है कि हे प्रभु ! कृपा करो, ताकि सुख प्राप्त हो॥४॥ २५॥ ३८॥

2भैरउ महला ५॥

3हे मालिक ! इस घोर कलियुग में तेरे आसरे ही रहता हूँ और

4तेरे आसरे तेरे ही गुण गाता हूँ।

5तेरी टेक पाने से मृत्यु भी मुझे स्पर्श नहीं करती,

6तेरा आसरा पाने से सब जंजाल नष्ट हो गए हैं।॥१॥

7दीन-दुनिया को तेरा ही अवलम्ब है और

8सब में केवल मालिक ही व्याप्त है॥१॥ रहाउ॥

9तेरे आसरे ही आनंद करता हूँ और

10तेरे आसरे ही गुरु-मंत्र जपता हूँ।

11तेरे आसरे ही संसार-सागर से पार हुआ जाता है।

12संसार का रखवाला परमेश्वर पूर्ण सुखों का सागर है।॥२॥

13तेरा सहारा पाने से कोई भय नहीं,

14परमसत्य परमेश्वर मन की सब भावनाओं को जाननेवाला है।

15हे प्रभु ! तेरी टेक ही मन का बल है और

16यहॉ (इहलोक) वहाँ (परलोक) तू ही हमारा सहारा है।३॥

17केवल तेरा ही आसरा है और तेरा ही भरोसा है,

18अतः सब लोग गुणागार प्रभु का ध्यान करते हैं।

19तेरे भक्त तेरा नाम जप-जपकर आनंद कर रहे हैं।

20नानक की विनती है कि सच्चे गुणों के भण्डार परमात्मा का स्मरण करो॥४॥ २६॥ ३६॥

21भैरउ महला ५॥

22पहले पराई निन्दा करना छोड़ दिया तो

23इससे मन की सारी चिंता दूर हो गई।

24इस प्रकार लोभ-मोह इत्यादि सबको दूर कर दिया तो

25प्रभु को आसपास देखकर परम वैष्णव हुए॥१॥

26संसार में ऐसा कोई विरला ही त्यागी है,

27वही व्यक्ति प्रभु नाम का जाप करता है॥१॥ रहाउ॥

28जब अहम् बुद्धि का साथ छोड़ा तो

29काम-क्रोध का रंग उतर गया।

30हरि-नाम का ध्यान

31साधु-पुरुषों के संग कर मुक्त हो गए॥२॥

32अब दुश्मन एवं दोस्त दोनों समान हो गए हैं और

33सब में पूर्ण रूप से भगवान ही दिखाई दे रहा है।

34प्रभु की आज्ञा को मानकर सच्चा सुख प्राप्त किया है और

35पूर्ण गुरु ने हरि-नाम का जाप ही मन में दृढ़ करवाया है॥३॥

36कृपा करके जिसकी वह स्वयं रक्षा करता है,

37वही भक्त प्रभु-नाम का जाप करता है।

38हे नानक ! गुरु से शिक्षा पाकर जिसके मन में आलोक हो गया है,

39उसी का जीवन-सफर पूर्ण सफल हो गया है॥४॥ २७॥ ४०॥

40भैरउ महला ५॥

41अधिकाधिक धन-दौलत कमाने में भी सुख नहीं है,

42नृत्य अथवा नाटक देखकर भी सुख नहीं मिलता।

43बहुत सारे देशों को जीतने में भी सुख नहीं,

44दरअसल प्रभु के गुण गाने से ही सर्व सुख प्राप्त होते हैं॥१॥

45परम सुख एवं सच्चा आनंद ही खोजो,

46बड़े भाग्य से साधु पुरुषों की संगत प्राप्त होती है। गुरुमुख बनकर प्रभु-नाम का यशगान करो॥१॥ रहाउ॥

47माता-पिता, पुत्र अथवा पत्नी मात्र बन्धनों में फँसाए रखते हैं।

48अहम्-भावना में किए गए धर्म-कर्म बन्धन बन जाते हैं।

49सब बन्धन काटनेवाला ईश्वर मन में बसता है,

50तो ही सुख प्राप्त होता है और अपने सच्चे घर (प्रभु) में जीव बसा रहता है।॥२॥

51केवल प्रभु ही देनेवाला है, सभी उसके मात्र भिखारी हैं।

52वह बे-अन्त, अपार एवं गुणों का भण्डार है।

53जिस पर प्रभु अपनी कृपा करता है,

54वही प्रभु-नाम का जाप करता है॥३॥

55हमारी अपने गुरु के समक्ष प्रार्थना है कि

56हे परमपुरुष, गुणों के भण्डार ! कृपा करो।

57नानक का कथन है कि हे मालिक ! तुम्हारी शरण में आ गया हूँ,

58जैसे तू चाहता है, वैसे ही मुझे रखना॥४॥ २८॥ ४१॥

59भैरउ महला ५॥

60गुरु से साक्षात्कार कर द्वैतभाव को त्याग दिया है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं