गुरु ग्रंथ साहिब 1146 · Raag Bhairao
1भैरउ महला ५॥
2हे प्रभु ! जिसे तू नाम देता है, वह निर्धन से धनवान बन जाता है,
3उसके अनेक पाप दूर हो जाते हैं और मन निर्मल हो जाता है,
4उसकी सब कामनाएँ एवं कार्य पूर्ण हो जाते हैं।
5अतः अपने भक्त को भी नाम प्रदान करो॥१॥
6ईश्वर की सेवा ही फल प्रदान करने वाली है।
7वह स्वामी करने-करवाने में समर्थ है, उससे कोई भी खाली नहीं लौटता॥१॥ रहाउ॥
8प्रभु इतना दयालु है कि रोगी का रोग नष्ट कर देता है,
9दुखियारे का हर गम मिटा देता है।
10हे प्रभु ! बेघर जीव को तू ही घर में बिठाने वाला है,
11अतः अपने दास को भक्ति में लगाए रखो॥२॥
12नाचीज व्यक्ति को हे प्रभु ! तू ही सम्मान प्रदान करता है,
13मूर्ख एवं बेवकूफ व्यक्ति भी तेरी कृपा से चतुर एवं ज्ञानवान बन जाता है।
14सब बुरी बलाओं का भय दूर होता है।
15अपने भक्तजनों के मन में तो प्रभु ही बसा रहता है॥३॥
16परब्रह्म प्रभु सर्व सुखों का घर है और
17हरि-नामामृत ही तत्वज्ञान है।
18वह कृपा कर संत पुरुषों को अपनी सेवा में लगाए रखता है।
19हे नानक ! वे साधु-संगति में परम-सत्य में ही समाए रहते हैं॥४॥ २३॥ ३६॥
20भैरउ महला ५॥
21संतों की मण्डली में प्रभु मन में आ बसता है,
22संतों की सभा में सब पाप-बुराइयाँ दूर हो जाती हैं।
23संतों की संगत में निर्मल आचरण होता है और
24संतों के संग केवल प्रभु से अटूट प्रेम होता है॥१॥
25संतमण्डल उस पावन स्थल का नाम है,
26जहाँ केवल परब्रह्म का गुणगान होता है।॥१॥ रहाउ॥
27संतों की मण्डली में जन्म-मरण निवृत्त हो जाता है और
28संतों के मण्डल में यम भी दुःख नहीं देता।
29संतों की संगत में निर्मल वाणी की वर्षा होती है और
30संतमण्डल में प्रभु-नाम की ही चर्चा होती है॥२॥
31संतमण्डल का स्थल निश्चल है और
32संत-संगत में पाप विनष्ट हो जाते हैं।
33संतों के मण्डल में पावन कथा होती रहती है,
34संतों का संग अहम् एवं दुखों को दूर कर देता है॥३॥
35संतमण्डल का कदापि नाश नहीं होता,
36संत-संगत में गुणों का भण्डार परमेश्वर रहता है।
37हे नानक ! वास्तव में संतमण्डल ही ईश्वर का निवास स्थान है और
38वहाँ तने-बाने की तरह भगवान रहता है ॥४॥२४॥३७॥
39भैरउ महला ५॥
40जब स्वयं ईश्वर बचानेवाला हो तो कोई रोग भला क्या बिगाड़ सकता है।
41उस व्यक्ति को कोई दु:ख संताप झेलना नहीं पड़ता।
42जिस पर प्रभु कृपा करता है,
43उसके सिर से काल भी हट जाता है॥१॥
44प्रभु-नाम सदा सहायता करने वाला है।
45जिसे स्मरण आता है, उसे सदा सुख प्राप्त होता है और मौत भी उसके निकट नहीं आती॥१॥ रहाउ॥
46जब यह जीव नहीं था, तब किसने इसे उत्पन्न किया ?
47इसका मूल भी क्या था और किससे यह प्रगट हुआ।
48सच तो यही है कि मारने एवं जिंदा करने वाला परमेश्वर ही है और
49अपने भक्तों का सदा पालन-पोषण करता है।॥२॥
50यह भी मानो सब कुछ उसके हाथ है,
51मेरा प्रभु अनाथ जीवों का नाथ है।
52उसका नाम दुःखो को नाश करने वाला है और
53उसके गुण गाने से सुख प्राप्त होता है।॥३॥
54हे स्वामी ! संतों की प्रार्थना सुनो;
55हमारा जीवन, प्राण, धन सब तुम्हारे ही पास है।
56यह जगत् तेरा है, सभी तेरा ध्यान करते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं