सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1144 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1ईश्वर जिसे अपनी लगन में लगा लेता है, वही लगता है और

2उसका जन्म-जन्म का सोया हुआ मन जागृत हो जाता है।॥३॥

3हे ईश्वर ! भक्तगण तेरे हैं और तू स्वयं भक्तों का है,

4अपनी महिमा का जाप तू स्वयं ही उनसे करवाता है।

5नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जगत के सब जीव-जन्तु तेरे वश में हैं और

6तू सदा ही हमारे साथ है॥४॥ १६॥ २६॥

7भैरउ महला ५॥

8भगवन्नाम हमारे मन की भावना को जाननेवाला है औरं

9नाम ही हमारे काम आता है।

10रोम-रोम में हरिनाम ही बसा हुआ है और

11पूर्ण सतगुरु ने यही दान किया है॥१॥

12प्रभु-नाम रूपी रत्न ही हमारा भण्डार है, जो

13अगम्य, अमूल्य एवं अपरम्पार है॥१॥ रहाउ॥

14हरि-नाम ही हमारा निश्चल मालिक है और

15नाम की महिमा सब में बनी हुई है।

16नाम ही हमारे लिए पूर्ण शाह है और

17नाम ही हमारे लिए बेपरवाह है॥२॥

18हरि-नाम ही हमारा प्रेम एवं भोजन है और

19हरि-नाम हमारे मन की कामनाओं को पूरा करता है।

20संत की कृपा से हरिनाम कदापि विस्मृत नहीं होता और

21नाम जपने से पूर्ण अनाहत ध्वनि श्रवण का आनंद मिलता है।॥३॥

22प्रभु-कृपा से नाम रूपी नवनिधि उपलब्ध हुई है और

23गुरु की कृपा से नाम से ही प्रेम बना हुआ है।

24जिसके पास हरि-नाम रूपी भण्डार है,

25वास्तव में वही धनवान एवं प्रधान है॥४॥ १७॥ ३०॥

26भैरउ महला ५॥

27हे ईश्वर ! तू ही मेरा माता-पिता है,

28तू ही मेरी आत्मा व प्राणों को सुख देने वाला है।

29तू मेरा मालिक है एवं मैं तेरा दास हूँ,

30तेरे अलावा मेरा कोई नहीं है॥१॥

31हे प्रभु ! कृपा कर यह देन प्रदान करो कि

32दिन-रात मैं तेरी प्रशंसा करता रहूँ॥१॥ रहाउ॥

33हम तेरे यंत्र हैं और तू बजाने वाला है।

34हम तेरें भिखारी मात्र हैं और तू ही देने वाला दाता है।

35तेरी कृपा से सब खुशियाँ मना रहे हैं और

36घट-घट में तू ही व्याप्त है॥२॥

37तेरी कृपा से ही नाम का जाप होता है और

38साधु पुरुषों के संग तेरे ही गुण गाते हैं।

39तेरी दया से दुख-दर्द नष्ट हो जाते हैं,

40तेरी अनुकंपा से हृदय-कमल खिल जाता है।॥३॥

41हे गुरुदेव ! मैं तुझ पर कुर्बान जाता हूँ,

42तेरे दर्शन फलदायक हैं और तेरी सेवा अति निर्मल है।

43नानक की विनती है कि हे मेरे प्रभु ! मुझ पर दया करो

44ताकि नित्य तेरा गुणगान करता रहूँ॥४॥ १८॥ ३१॥

45भैरउ महला ५॥

46जिसका दरबार सबसे ऊँचा है,

47उस ऑकार को सदैव अभिवन्दन है।

48जिसका स्थान सर्वोपरि है,

49उस हरि-नाम के जाप से करोड़ों पाप-अपराध मिट जाते हैं।॥१॥

50उसकी शरण में आने से सदा सुख प्राप्त होता है,

51जिस पर कृपा कर देता है, उसे अपने साथ मिला लेता है॥१॥ रहाउ॥

52जिसके कौतुक दिखाई नहीं देते,

53सब लोगों की जिस पर अटूट आस्था है,

54वह साधु पुरुषों की संगत में रहने से प्रगट होता है।

55भक्तगण निष्ठापूर्वक दिन-रात उसकी आराधना करते रहते हैं। २॥

56वह जितना भी देता है, उसके भण्डार में कोई कमी नहीं आती।

57वह पल में बनाने-बिगाड़ने वाला है।

58जिसका हुक्म कोई भी नहीं टाल सकता,

59वह सच्चा परमेश्वर समूची सृष्टि का बादशाह है॥३॥

60जिसका अवलम्ब सब प्राप्त करते हैं, उसी की हमें आशा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं