सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1143 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1सबमें एक परब्रह्म ही पूर्ण रूप से भरपूर है।

2जिसे पूर्ण सतगुरु प्राप्त हो जाता है, वही उसका जाप करता है।

3प्रभु का कीर्तन ही उसका आसरा बन जाता है

4हे नानक ! जिस पर प्रभु स्वयं दयालु हो जाता है॥४॥ १३॥ २६॥

5भैरउ महला ५॥

6मुझ दुहागिन का प्रभु ने स्वयं ही श्रृंगार किया है और

7रूप-रंग देकर नाम से संवार दिया है।

8सभी दुःख और संताप मिट गए

9जब गुरु मेरे माई बाप (संरक्षक) बन गए॥१॥

10हे सखी सहेलियो ! मेरे हृदय-घर में आनंद ही आनंद है क्योकि

11कृपा कर के मुझे पति-प्रभु मिल गया है॥१॥ रहाउ॥

12मेरी जलन बुझ गई है, सब आशाएँ पूर्ण हो गई हैं।

13अन्धेरा मिटकर प्रकाश हो गया है।

14अनाहत शब्द का श्रवण अद्भुत व आनंदमय बन गया

15पूर्ण गुरु की पूर्ण कृपा से॥२॥

16जिसके मन में प्रभु प्रगट हो जाता है,

17उसके दर्शन से जीव सदा के लिए निहाल हो जाता है।

18जिसे सतगुरु प्रभु-नाम की देन प्रदान करता है,

19उसके ही पास सर्वगुणों के अनेक भण्डार हैं।॥३॥

20जिसे ईश्वर मिल जाता है,

21प्रभु को जपकर उसका मन तन शीतल हो जाता है।

22हे नानक ! जो संतजन प्रभु को अच्छे लगते हैं,

23उनकी चरणरज कोई विरला ही पाता है॥४॥ १४॥२७॥

24भैरउ महला ५॥

25पाप करने में जरा-सा आलस्य नहीं करता,

26वेश्या से भोग करने में थोड़ी-सी भी शर्म नहीं आती,

27धन पाने के लिए सारा दिन मेहनत-मजदूरी करता है,

28परन्तु ईश्वर स्मरण के समय सिर पर वज्र पड़ता है।॥१॥

29माया-मोह में लीन होकर सारा संसार भूला हुआ है।

30दरअसल भुलाने वाले ईश्वर ने इसे स्वयं ही भुलाया हुआ है और वह व्यर्थ ही इन कार्यों में रचा हुआ है।॥१॥ रहाउ॥

31माया के रंग देखते पूरी जिन्दगी गुजर जाती है।

32जीव एक कौड़ी से लगाव लगाकर हिसाब में गड़बड़ करता है,

33अन्ध व्यवहार में बंधा हुआ मन दौड़ता रहता है,

34मगर बनानेवाला परमेश्वर दिल में याद ही नहीं आता॥२॥

35ऐसे करते-करते ही दु:ख प्राप्त करता है और

36माया के मोह में फँसकर इसका कार्य पूर्ण नहीं होता।

37मन केवल काम-क्रोध एवं लोभ में ही आसक्त रहता है और

38जल विन मछली की तरह तड़पता हुआ मरता है॥३॥

39जिसका रखवाला स्वयं ईश्वर होता है,

40वह सदा प्रभु का भजन करता है।

41साधु-संतों की संगत में जिसने परमात्मा का गुणगान किया है,

42हे नानक ! उसने पूर्ण सतगुरु को पा लिया है॥४॥ १५॥ २८॥

43भैरउ महला ५॥

44जिस पर ईश्वर दया करता है, वही उसे पाता है और

45प्रभु का नाम उसके मन में बसाता है।

46जिसके मन में सच्चा शब्द स्थित होता है,

47उसके जन्म-जन्मांतर के पाप दूर हो जाते हैं।॥१॥

48राम-नाम ही हमारे प्राणों का आधार है।

49हे भाई ! गुरु की कृपा से नित्य हरि नाम जपो और संसार-सागर से मुक्ति पा लो॥१॥ रहाउ॥

50जिनके भाग्य में हरि-नाम रूपी निधि को पाना लिखा है,

51वही भक्तगण प्रभु-दरबार में शोभा पाते हैं।

52सहज-स्वभाव आनंदपूर्वक ईश्वर का गुणगान करो,

53इससे आगे निराश्रय को भी आश्रय मिल जाएगा॥२॥

54युग-युगान्तर से यही सार तत्व है कि

55ईश्वर का स्मरण ही सच्चा विचार है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं