गुरु ग्रंथ साहिब 1141 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji
1रोगों के बन्धन में पड़कर उसे बिल्कुल भी ठिकाना नहीं मिलता और
2सतगुरु के बिना उसके रोग कदापि दूर नहीं होते॥३॥
3परब्रह्म ने जिस पर भी दया की है,
4उसे बाँह से पकड़कर रोगों से मुक्त कर दिया है।
5साधु पुरुषों का साथ पाने से सब बन्धन टूटते हैं।
6हे नानक ! गुरु ने सब रोगों को मिटाया है॥४॥ ७॥ २०॥
7भैरउ महला ५॥
8ईश्वर स्मरण आए तो परम आनंद प्राप्त होता है,
9प्रभु याद आ जाए तो सब दुःख नष्ट हो जाते हैं।
10मन में प्रभु की स्मृति बनी रहे तो हर श्रद्धा पूरी हो जाती है,
11उसकी याद आने से कभी परेशान नहीं होना पड़ता॥१॥
12ईश्वर मन में ही प्रगट हो गया
13जब पूरे गुरु ने जब ईश्वर की लगन में लगा दी॥१॥ रहाउ॥
14अगर प्रभु याद आए तो मनुष्य सबका राजा बन जाता है,
15प्रभु की याद आती रहे तो सब कार्य सम्पन्न हो जाते हैं।
16भगवान स्मरण आए तो प्रेम का रंग चढ़ा रहता है,
17प्रभु का चिन्तन हो तो जीव सदा आनंदित रहता है।॥२॥
18ईश्वर याद आता रहे तो मनुष्य सदा धनवान् बना रहता है,
19परमात्मा का ध्यान हो तो सदा आत्म-निर्भर रहता है।
20परमेश्वर स्मरण आता रहे तो सब खुशियाँ प्राप्त होती हैं,
21प्रभु का ध्यान हो तो लोगों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती॥३॥
22ईश्वर याद आए तो सहज ही सच्चा घर प्राप्त हो जाता है,
23उसकी स्मृति बनी रहे तो शून्यावस्था में लीन हो जाता है।
24अगर प्रभु याद आता रहे तो जीव सदैव उसका कीर्तन करता रहता है।
25नानक फुरमाते हैं कि इस तरह मन भगवान में लीन रहकर आनंदित हो जाता है॥ ४॥ ८॥ २१॥
26भैरउ महला ५॥
27हमारा पिता परमेश्वर सदैव चिरंजीव है,
28हमारे भाई-बंधु सदा जीवन पा रहे हैं,
29हमारे मित्र सदा अविनाशी हो गए।
30हमारा पूरा परिवार सच्चे घर में रह रहा है॥१॥
31हमें परम सुख उपलब्ध हुआ तो सभी सुखी हो गए।
32पूरे गुरु ने पिता परमेश्वर के साथ मिला दिया है॥१॥ रहाउ॥
33मेरा घर सबसे ऊँचा है,
34देश मेरा अनंत है, कोई पूछताछ नहीं।
35हमारा राज्य निश्चय हो गया है और
36हमारा माल अक्षुण्ण अप्रभावित है॥२॥
37पूरे जगत में मेरी शोभा हो गई है,
38देश-दिशांतर हमारी प्रतिष्ठा बनी है I
39घर-घर में हमारी कीर्ति फैली है और
40सब लोगों में हमारी भक्ति का प्रचार हो गया है॥३॥
41हमारे अन्तर्मन में ही पिता प्रभु प्रगट हो गया है,
42अब पिता-पुत्र ने मिलकर साझ कर ली है।
43नानक फुरमाते हैं कि अगर पिता खुश हो जाए तो
44वह अपने पुत्र को अपने रंग में लीन कर लेता है॥४॥६॥ २२॥
45भैरउ महला ५॥
46हे सतगुरुं प्रभु ! तू प्रेमस्वरूप, परमपुरुष एवं दाता है,
47हम तो अपराधी हैं और तू ही हमें क्षमा करने वाला है।
48जिस पापी व्यक्ति को कहीं आसरा नहीं मिलता,
49अगर तेरी शरण में आ जाए तो पाप-मुक्त होकर निर्मल हो जाता है।॥१॥
50सतगुरु को मनाकर सुख प्राप्त हुआ है और
51गुरु का ध्यान करने से सब फल पा लिए हैं।॥१॥ रहाउ॥
52हे परब्रह्म सतगुरु ! तुम्हें शत्-शत् नमन है,
53यह मन तन सब तेरी ही देन है।
54भ्रम का पद हटा तो तू नजर आया।
55हे विश्व के बादशाह ! तू ही सबका मालिक है॥२॥
56अगर उसकी रज़ा हो तो सूखी लकड़ी हरी हो जाती है,
57अगर उसकी इच्छा हो तो सूखा सरोवर जल से भर जाता है,
58उसकी मर्जीं हो तो सब फल प्राप्त हो जाते हैं,
59सतगुरु के चरणों में लगने से चिंता दूर हो जाती है।॥३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं