गुरु ग्रंथ साहिब 1140 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji
1उसके सब कार्य सम्पन्न हो जाते हैं।
2हे नानक ! उसकी रक्षा करने वाली केवल वही परम शक्ति है,
3जिस तक कोई पहुँच नहीं सकता॥४॥४॥१७॥
4भैरउ महला ५॥
5दर्द तो हमें तब हो, अगर ईश्वर हमसे कहीं बाहर है अथवा
6तो ही हम दुखी होते हैं, जब भगवान भूल जाता है।
7अगर द्वैतभाव में आसक्त हो जाएँ तो पीड़ा होती है।
8जब प्रभु सबमें व्याप्त है तो दर्द किस तरह होगा ?॥१॥
9माया-मोह में फँसकर जीव दुःख ही पाता है और
10प्रभु-नाम के बिना भ्रम में खपता है॥१॥रहाउ॥
11दुःखी तब होते हैं अगर कोई अन्य कर्ता है।
12अगर कोई बुरी मौत मरता है तो बड़ा दु:ख होता है।
13जब कुछ जानता ही नहीं तो दुख की अनुभूति होती है।
14ईश्वर सबमें भरपूर रूप से व्याप्त है, फिर भला कैसे तकलीफ हो सकती है।॥२॥
15अगर कुछ जुल्म अथवा जबरदस्ती हो जाए तो हम दु:ख के शिकार होते हैं,
16अगर कोई गलती से किसी को सताता है तो भी हमें दर्द होता है।
17गुरु ने यही सत्य बताया है कि जो होता सब प्रभु की इच्छा से ही होता है।
18तब सब दुख-परेशानियों को छोड़कर हम निश्चिंत होकर सोते हैं।॥३॥
19हे प्रभु ! तू सबका मालिक है और सब तेरा ही बनाया हुआ है।
20जैसा तुझे उचित लगता है, वैसा ही निपटारा करता है।
21दूसरा कोई नहीं, केवल यही सर्वव्यापक है।
22हे ईश्वर ! नानक की प्रार्थना है कि शरण में आने वाले की लाज रखो॥४॥५॥ १८॥
23भैरउ महला ५॥
24संगीत के बिना कैसे नृत्य किया जा सकता है और
25कण्ठ के बिना कैसे गाया जा सकता है।
26जील बिना रबाब भी बजाया नहीं जा सकता,
27वैसे प्रभु नाम स्मरण के बिना सब कार्य विफल हो जाते हैं।॥१॥
28बताओ, नाम बिना किसकी मुक्ति हुई है,
29सच्चे गुरु के बिना कोई संसार-सागर से पार नहीं हो सका॥ १॥रहाउ॥
30जिस प्रकार जीभ के बिना कोई बोल नहीं सकता,
31कानों के बिना कोई सुन नहीं सकता।
32आँखों के बिना कोई देख नहीं सकता,
33वैसे ही प्रभु-नाम के बिना मनुष्य का कोई वजूद नहीं॥२॥
34विद्या के बिना कोई पण्डित अथवा विद्वान नहीं बनता।
35ताकत अथवा अधिकार के बिना कैसे कोई शासन कर सकता है।
36ज्ञान के बिना मन स्थिर नहीं होता,
37प्रभु नाम स्मरण बिना समूचा जगत बावला है॥३॥
38वैराग्य के बिना कोई वैरागी नहीं कहलाता और
39अहम का त्याग किए बिना कैसे कोई त्यागी हो सकता है।
40ज्यों कामादिक पाँच इन्द्रियों को वशीभूत किए बिना मन स्थिर नहीं होता,
41इसी तरह प्रभु नाम के चिंतन बिना मनुष्य सदैव कष्ट पाता है॥४॥
42गुरु दीक्षा के बिना ज्ञान कैसे संभव है?
43बिना देखे ध्यान भी नहीं लग सकता।
44बिना भय के कथनी में सब विकार ही हैं।
45हे नानक ! अतः सच्चे द्वार (प्रभु) का चिंतन करो॥ ५॥ ६॥१६॥
46भैरउ महला ५॥
47अहम् रोग मनुष्य को दिया है,
48कामवासना के रोग के कारण हाथी कैद में फंस जाता है।
49दृष्टि रोग के परिणामस्वरूप पतंगा जलकर नष्ट हो जाता है और
50हिरण संगीत के स्वर रोग के कारण दुखी होता है।॥१॥
51संसार में जो जो दिखाई दे रहा है, वही रोगी है।
52मगर मेरा योगी सतगुरु सब रोगों से रहित है॥१॥ रहाउ॥
53जीभ के रोग के कारण मछली जाल में फँस जाती है,
54भेंवरा सुगन्धि रोग के कारण नष्ट हो जाता है।
55समूचे संसार को मोह-प्रेम का रोग लगा हुआ है और
56तीन गुणों के रोग में पड़कर विकारों में और भी वृद्धि होती है।॥२॥
57जीव रोग में ही मरता है और रोग में ही जन्म'लेता है।
58रोगों के कारण ही पुनः पुनः योनि चक्र में घूमता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं