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गुरु ग्रंथ साहिब 113 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji

1हे भगवान ! तू स्वयं ही सृष्टि का निर्माण करके एवं विनाश करके संवारता है। हे नानक ! भगवान जीवों को अपने नाम में लगाकर उन्हें सुन्दर बना देता है ॥८॥५॥६॥

2माझ महला ३ ॥

3समस्त जीवों में व्यापक होकर भगवान स्वयं ही पदार्थों को भोगने वाला है।

4अदृष्य, अगम्य, अनन्त परमात्मा सर्वत्र व्यापक हो रहा है।

5गुरु के शब्द द्वारा मेरे प्रभु-परमात्मा का ध्यान करने से मनुष्य सहज ही सत्य में लीन हो जाता है॥१॥

6मैं तन-मन से उन पर न्यौछावर हूँ, जो गुरु की वाणी को अपने हृदय में बसाते हैं।

7यदि मनुष्य को गुरु की वाणी का ज्ञान हो जाता है, तब वह अपने मन से युद्ध करता है और अपनी तृष्णा को निवृत्त करके परमेश्वर में समा जाता है॥१॥ रहाउ॥

8माया के पाँच दूत-काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जगत् के जीवों के सद्गुणों को लूट रहे हैं।

9ज्ञानहीन अन्धे मनमुख को इसका कोई ज्ञान नहीं।

10जो गुरमुख हो जाता है, वह अपना हृदय रूपी घर इन दूतों से बचा लेता है। पांचों ही कट्टर वैरी गुरु के उपदेश से नाश किए जाते हैं।॥२॥

11कई गुरमुख हमेशा सत्यस्वरूप ईश्वर के प्रेम में मग्न रहते हैं।

12वह स्वाभाविक ही अपने ईश्वर की भक्ति करते हैं और रात-दिन उसके प्रेम में मस्त रहते हैं।

13जो मनुष्य प्रियतम गुरु से मिलकर सत्यस्वरूप परमात्मा का यशोगान करते हैं, वह ईश्वर के दरबार में शोभा पाते हैं।॥३॥

14पहले, प्रभु निराकार था। वह स्वंयभू है और उसने स्वयं ही अपना एक साकार रूप पैदा किया,

15दूसरा, द्वैत-भाव की सूझ को और तीसरा, रज, तम एवं सत त्रिगुणात्मक माया उत्पन्न की। त्रिगुणात्मक माया द्वारा सृष्टि-रचना हुई। त्रिगुणात्मक माया के जीव चौरासी लाख योनियों के चक्र में पड़े रहते हैं।

16इन जीवों को ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश देने के लिए संत, साधु, भक्त एवं ब्रह्मज्ञानी उत्पन्न किए गए जिन्हें गुरमुख कहा जाता है। यह चौथे पद की अवस्था वाले होते हैं। जिसे तुरीया पद भी कहा जाता है। गुरमुख अवस्था सर्वोच्च अवस्था है। वह नाम-सिमरन की साधना करते हैं॥४ ॥

17जो सत्यस्वरूप परमात्मा को अच्छा लगता है, सब सत्य है।

18जो सत्य को पहचानता है, वह प्रभु में विलीन हो जाता है।

19गुरमुख की जीवन-मर्यादा सदपुरुष की भक्ति-सेवा ही करती है। वे जाकर सत्य में ही समा जाते हैं।॥५॥

20सत्य (ईश्वर) केअलावा अन्य कोई दूसरा नहीं।

21माया के मोह में फंस कर दुनिया बड़ी व्याकुल होकर मरती है।

22जो गुरमुख होता है, वह केवल एक ईश्वर को ही जानता है और एक ईश्वर की भक्ति करके सुख पाता है॥६॥

23हे भगवान ! समस्त जीव-जन्तु तुम्हारी शरण में हैं।

24यह जगत् एक चौपड़ की खेल है। तूने जीवों को इस खेल की कच्ची-पक्की गोटियाँ बनाया है। तू स्वयं ही जीवों की देखभाल करता है।

25तू स्वयं ही जीवों से कामकाज करवाता है और तू स्वयं ही इन्हें गुरु से मिलाकर अपने साथ मिलाने वाला है॥ ७॥

26हे प्रभु ! जो जीव तुझे प्रत्यक्ष देखते हैं, तू उन्हें स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है।

27तू स्वयं ही समस्त जीवों में विद्यमान हो रहा है।

28हे नानक ! भगवान स्वयं ही सर्वव्यापक है परन्तु इसका ज्ञान गुरमुखो को ही होता है ॥८॥६॥७॥

29माझ महला ३ ॥

30अमृत रूपी गुरु की वाणी बड़ी मीठी है।

31कोई विरला गुरमुख ही इसको चख कर देखता है।

32जो इस अमृत रूपी महारस का पान करता है, उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है और सत्य प्रभु के दरबार में अनहद शब्द बजने लगता है।॥१॥

33मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो गुरु के चरणों में मन को लगाते हैं।

34सतिगुरु अमृत का सत्य सरोवर है। जब मन इसमें स्नान करता है तो वह अपने विकारों की मैल दूर कर लेता है॥१॥ रहाउ॥

35हे सत्यस्वरूप ईश्वर ! तेरा अन्त कोई भी नहीं जानता।

36गुरु की दया से कोई विरला पुरुष ही तेरे चरणों में अपना मन लगाता है।

37इतनी बड़ी क्षुधा सत्यनाम की मुझे लगी हुई है कि तेरी उपमा करने से मुझे कदाचित तृप्ति नहीं होती ॥ २॥

38मैं केवल एक ईश्वर को देखता हूँ और किसी अन्य दूसरे को नहीं।

39गुरु की दया से मैंने नाम रूपी अमृत पान कर लिया है।

40गुरु के शब्द से मेरी तृष्णा बुझ गई है और मैं स्वाभाविक ही सदैव सुख में लीन हो गया हूँ॥३॥

41रत्न जैसे अमूल्य नाम को व्यर्थ ही त्याग कर

42ज्ञानहीन मनमुख व्यक्ति माया के प्रेम में लीन हो रहता है

43वह जैसा बीज बोता है, वह तैसा ही फल पाता है। जिसके कारण स्वप्न में भी उसे सुख प्राप्त नहीं होता ॥४॥

44जिस मनुष्य पर परमात्मा अपनी दया करता है, वही गुरु को प्राप्त करता है।

45गुरु के शब्द को वह अपने हृदय में बसाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं