सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1138 · Raag Bhairao · Guru Arjan Dev Ji

1प्रभु-नाम के सिवा सारी दुनिया धूल समान है॥१॥

2तेरी बनाई कुदरत अद्भुत है और तेरे उपकार भी प्रशंसनीय हैं।

3हे सच्चे बादशाह ! तेरी स्तुति का कोई मूल्य नहीं है॥२॥

4हे खुदा ! बेसहारा लोगों का तू ही सहारा है और तू ही उनकी पनाह है।

5हे गरीब-नवाज ! मैं दिन-रात तेरे ध्यान में लीन रहता हूँ॥३॥

6नानक का कथन है कि मालिक खुद ही उस पर मेहरबान है और

7दिल-प्राण से वह अल्लाह हरगिज नहीं भूलता॥४॥ १०॥

8भैरउ महला ५॥

9प्रभु-नाम रूपी सच्चा पदार्थ गुरु से प्राप्त करो और

10प्रभु की रज़ा को सत्य समझकर मानो॥१॥

11आध्यात्मिक तौर पर जिंदा रहना है तो

12राम नाम रूपी रसायन का नित्य उठकर पान करो।

13हे सज्जनो, हरदम जिह्म से ईश्वर के गुण गाओ॥१॥ रहाउ॥

14कलियुग में केवल प्रभु-नाम से ही संसार के बन्धनों से उद्धार हो सकता है

15नानक यही ब्रह्म-विचार बोलता है॥२॥ ११॥

16भैरउ महला ५॥

17सतगुरु की सेवा करने से सब फल प्राप्त हो जाते हैं और

18जन्म-जन्मांतर की मैल निवृत्त हो जाती है॥१॥

19हे प्रभु! तेरा नाम पापी जीवों को पावन करनेवाला है और

20पूर्व कर्मानुसार प्रारब्ध से ही तेरे गुण गाने का सुअवसर प्राप्त होता है॥१॥ रहाउ॥

21साधु पुरुषों के संग रहने से उद्धार हो जाता है और

22इस तरह प्रभु के द्वार पर शोभा प्राप्त होती है॥२॥

23प्रभु-चरणों की सेवा से सर्व कल्याण होता है और

24देवी-देवता एवं मनुष्य भी उसकी चरण-धूलि की आकांक्षा करते हैं।॥३॥

25नानक का कथन है कि हमने भी हरिनाम रूपी सुखनिधान को पा लिया है,

26जिसका निरन्तर जाप करके सारे जहान का उद्धार हो गया है॥४॥ १२॥

27भैरउ महला ५॥

28ईश्वर अपने दास को गले से लगा लेता है,

29किन्तु निंदक को दु:खों की अग्नि में डाल देता है॥१॥

30परमेश्वर ही पापी से बचाता है,

31पापी की कहीं भी गति नहीं होती और वह अपने किए कर्मों का ही फल भोगता है॥१॥ रहाउ॥

32दास की प्रभु से प्रीति लगी हुई है और

33निंदक का बहुत बुरा हाल हुआ है।॥२॥

34परब्रह्म ने अपने विरद् को प्रकट किया है और

35दोषी ने अपने किए कर्मो की सजा प्राप्त की है॥३॥

36ईश्वर न आता है, न हो जाता है, सब में ही समाया रहता है,

37दास नानक प्रभु की शरण में ही रहता है॥४॥ १३॥

38रागु भैरउ महला ५ चउपदे घरु २

39ੴ सतिगुर प्रसादि॥

40सुखदाता निरंकार ब्रह्म ही सबको उत्पन्न करने वाला है।

41ऐसे प्रभु को छोड़कर विषय-विकारों में मस्त जीव अन्य की ही सेवा करता है॥१॥

42हे मेरे मन ! तू ईश्वर का भजन-संकीर्तन कर,

43क्योंकि मैंने अन्य सब उपाय करके देख लिए हैं, अगर उनके बारे में सोचा जाए तो सब कार्य बिगड़ जाते हैं।॥१॥ रहाउ॥

44अन्धा-अज्ञानी मनमुख, मालिक को छोड़कर उसकी दासी माया को याद करता है,

45वह प्रभु की भक्ति करने वालों की निंदा करता रहता है, ऐसा निगुरा व्यक्ति पशु समान है॥२॥

46यह प्राण, शरीर, तन-धन सब प्रभु का दिया हुआ है, मगर मायावी पुरुष इनको अपना बताता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं