गुरु ग्रंथ साहिब 1134 · Raag Bhairao · Guru Raam Daas Ji
1गुरु उपदेश द्वारा एकाग्रचित होकर परमेश्वर का भजन करो॥१॥
2हे मेरे मन ! नारायण-स्वरूप हरि-नाम का भजन-संकीर्तन करो।
3यद्यपि सुखदाता ईश्वर कृपा कर दे तो गुरु के माध्यम से उसका नाम संसार-सागर से पार करवा देता है॥१॥ रहाउ॥
4साधुओं की संगत में मिलकर प्रभु का यशगान होता है और
5गुरु के निर्देशानुसार राम नाम रूपी औषधि प्राप्त की जा सकती है।॥२॥
6गुरु-साधु के अमृत ज्ञान रूपी सरोवर में स्नान करो,
7इससे सभी पाप-दोष दूर हो जाते हैं।॥३॥
8हे ईश्वर ! तू ही बनानेवाला है और सृष्टि को सहारा देने वाला है।
9नानक की विनती है कि मुझे अपने संग मिला लो, क्योंकि वह तो तेरे दासों का भी दास है॥४॥१॥
10भैरउ महला ४॥
11वही सफल घड़ी है, जब ईश्वर का संकीर्तन होता है।
12गुरु के उपदेश से सब दुख दूर हो जाते हैं।॥१॥
13हे मेरे मन ! परमेश्वर का भजन करो,
14अगर वह कृपा कर दे तो पूर्ण गुरु से मिलाप हो जाता है, सत्संगति में संसार-समुद्र से उद्धार हो जाता है।॥१॥ रहाउ॥
15हे मन ! संसार के जीवन प्रभु का चिंतन कर ले,
16तेरे करोड़ों पाप दूर हो जाएँगे॥२॥
17अगर सत्संगति में साधु की चरण-धूल मुँह-माथे पर लग जाए तो
18उससे अड़सठ गंगा स्नान का फल प्राप्त हो जाता है।॥३॥
19नानक की विनती है कि हे प्रभु ! मुझ मूर्ख पर कृपा करो;
20इस संसार-सागर से पार उतार दो॥४॥२॥
21भैरउ महला ४॥
22शुभ कर्म करना ही जप माला है,
23इसे हृदय में फेरते चलो अर्थात् शुभ कर्म करो; इसी का फल प्राप्त होगा॥१॥
24ईश्वर का नाम जपो,
25अगर कृपा कर सत्संगत में मिला दे तो माया का यम जाल टूट जाता है।॥१॥ रहाउ॥
26जिसने गुरु की सेवा की है,
27उस सच्ची टकसाल में शब्द के स्फोट से उसका जीवन संवर गया है॥२॥
28ईश्वर अगम्य-अगोचर है और गुरु ने उसका दर्शन करवा दिया है,
29इस प्रकार शरीर रूपी नगर में ही उसे पा लिया है॥ ३॥
30हम ईश्वर की संतान हैं, वह पिता की तरह हमारा पोषण करता है।
31नानक का कथन है कि यदि प्रभु की करुणा-दृष्टि हो जाए तो जीव संसार-सागर से पार हो जाता है॥४॥३॥
32भैरउ महला ४॥
33हे परमेश्वर ! सब शरीर तेरे हैं, तू सर्वव्यापक है और
34तुझ से बाहर कोई नहीं॥१॥
35हे मेरे मन ! सुखदाता परमेश्वर का जाप करो;
36हे प्रभु ! मैं तेरी प्रशंसा करता हूँ, तू ही मेरा पिता है॥१॥ रहाउ॥
37जहाँ देखता हूँ, वहाँ प्रभु ही है।
38सब तेरे वश में है, दूसरा अन्य कोई नहीं॥२॥
39हे प्रभु ! जिसे तुम स्वेच्छा से बचाते हो,
40उसके निकट कोई दुरात्मा भी नहीं जाती॥३॥
41सागर, भूमि व आसमान सबमें तू ही व्याप्त है।
42नानक का कथन है कि हे हरि ! जाप करने से तू साक्षात् दिखाई देता है॥ ४॥४॥
43भैरउ महला ४ घरु २
44ੴ सतिगुर प्रसादि॥
45ईश्वर का भक्त तो ईश्वर की मूर्ति समान है, जिसके हृदय में हरिनाम ही बसा रहता है।
46जिसका उत्तम भाग्य हो, वह गुरु-मतानुसार हरिनाम स्मरण करता है॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं