गुरु ग्रंथ साहिब 1132 · Raag Bhairao · Guru Amar Daas Ji
1जिसके मन में प्रभु बस गया है, वही व्यक्ति शोभा का पात्र है और उसके हृदय में प्रभु नाम की स्मृति बसी रहती है॥३॥
2जिसे सतगुरु ने सच्चा घर-द्वार दिखा दिया है, वह आनंद ही पाता है।
3हे नानक ! वह जो कुछ कहता है, उसे ही भला मानता है और प्रभु-नाम का ही उच्चारण करता रहता है॥४॥६॥१६॥
4भैरउ महला ३॥
5जो गुरु-उपदेश का चिंतन कर अपनी लालसाओं को मन में से दूर कर लेता है,
6तदन्तर पूरे गुरु से सूझ पाकर वह जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है॥१॥
7हे मेरे मन ! राम नाम एकमात्र आसरा है,
8गुरु की कृपा से मोक्ष प्राप्त हुआ है और सब इच्छाएँ पूरी हो गई हैं।॥१॥ रहाउ॥
9सबमें एक ईश्वर ही रमण कर रहा है, मगर गुरु के बिना इस तथ्य का ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
10गुरु द्वारा ही मेरा प्रभु अन्तर्मन में प्रकट होता है और फिर नित्य उसका गुणगान होता रहता है॥२॥
11केवल परमात्मा ही सुख देने वाला है और कहीं अन्य सुख प्राप्त नहीं होता।
12जिन्होंने दाता सतगुरु की उपासना नहीं की, वे अन्ततः पछताते ही गए हैं।॥३॥
13सतगुरु की सेवा से सदा सुख ही प्राप्त होता है और पुनः कोई दुख नहीं लगता।
14हे नानक ! फलस्वरूप प्रभु-भक्ति प्राप्त हो जाती है और आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है॥४॥ ७॥ १७॥
15भैरउ महला ३॥
16गुरु के बिना संसार बावला बनकर भूला हुआ है, अतः दुःख भोगता है।
17वह बार-बार मरता-जन्मता है, सदा दुख पाता है परन्तु सच्चे द्वार का ज्ञान प्राप्त नहीं करता॥१॥
18हे मेरे मन, सदैव गुरु की शरण में रहो,
19फिर प्रभु का नाम हृदय में सदैव मीठा लगता है और गुरु-उपदेश द्वारा संसार-सागर से उद्धार हो जाता है॥१॥ रहाउ॥
20जीव बहुत दिखावे करता है, उसका मन डगमगाता है, अन्तर्मन में काम, क्रोध एवं अहंकार भरा रहता है।
21उसके मन को तृष्णा की भूख लगी रहती है और फिर बहुत बकवाद करता है॥२॥
22अगर गुरु के उपदेश द्वारा जीव कामादिक विकारों की ओर से मरकर जीवन बिताए तो मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
23उसके ही मन को शान्ति प्राप्त होती है, वह प्रभु को मन में बसाकर रखता है और सदा सुखी रहता है।॥३॥
24जैसा ईश्वर चाहता है, वैसे ही चलाता है और अपने आप हम कुछ नहीं कर सकते।
25नानक का मत है कि जो गुरु के सान्निध्य में शब्द का मनन करता है, उसी को राम-नाम से बड़ाई मिलती है।॥४॥ ८॥ १८॥
26भैरउ महला ३॥
27अहम् एवं माया-मोह में भटककर जीव दुख कमाता है और दुख ही भोगता है।
28अन्तर्मन में लोभ का पागलपन भारी दुख का कारण बनता है और अविवेक के कारण वह भटकता है॥१॥
29मनमुखी जीव का संसार में जीना ही धिक्कार योग्य है,
30राम नाम उसे सपने में भी याद नहीं आता और प्रभु से वह कभी प्रेम नहीं लगाता॥१॥ रहाउ॥
31वह पशु की तरह कर्म करता है, मगर तथ्य को नहीं बूझता, इस प्रकार झूठ कमाता है और झूठा ही सिद्ध होता है।
32अगर सतगुरु से साक्षात्कार हो जाए तो उसका जीवन-आचरण बदल जाता है और वह प्रभु को खोज लेता है॥२॥
33जिसके हृदय में सदा हरिनाम बसा रहता है, वह उस गुणों के भण्डार को पा लेता है।
34गुरु की कृपा से पूर्ण प्रभु प्राप्त हो जाता है और मन का अभिमान दूर हो जाता है।॥३॥
35हे भाई ! ईश्वर स्वयं ही सब करने-करवाने वाला है और स्वयं ही सन्मार्ग लगाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं